अवाम क्यों अपनी समस्या को लेकर मुख्यमंत्री से गुहार लगाती दिखती है

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अवाम

झारखंड की पिछली सत्ता अगर ढोल पीटते हुए कहे असंगठित क्षेत्र के अवाम के लिए एक नयी पेंशन योजना उसके केंद्री सत्ता ने पेश की है। और उसके आसरे यह दावा करे कि इससे असंगठित क्षेत्र के मज़दूर, जो बुढ़ापे में या असहाय होने के स्थिति में अपनी आजीविका का इन्तज़ाम नहीं कर सकते, को सामाजिक सुरक्षा दी है, परखना जरूरी हो जाता है। 

तो अबतक असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले तमाम मज़दूरों जैसे घरेलू कामगार, ड्राइवर, प्लम्बर, रेहड़ी-पटरी वाले, रिक्‍शा चालक, खेती और निर्माण कार्य से जुड़े मज़दूर, कूड़ा बीनने वाले, बीड़ी बनाने वाले, घर से काम करने वाले, हथकरघा कामगार, चमड़ा कामगार, मिड-डे मिल वर्कर, ईंट भट्ठा मज़दूर, धोबी, घरों में फे़री लगाने वाले, चीर-फाड़ करने वाले, बिजली कॉन्ट्रैक्ट मज़दूर आदि, की समस्या क्यों नही दूर हुई। 

तो फिर तमाम प्रकार के असंगठित क्षेत्र के कामगार चुनाव के पहले तक राँची के सड़को पर आन्दोलनरत क्यों दिखी, जिसपर पिछली सरकार ने लाठियां तक बरसाई, दिव्यांगों तक को नहीं बख़्शा गया? यदि यह भलाई के कदम सरकार ने जनता के लिए उठाये, तो फिर क्यों इनके द्वारा 370 व हिन्दू-मुसलमान के आसरे वोट मांगे गए व साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनायी गयी। 

देखा जाए तो इन तमाम मुदों पर पिछली सरकार इतनी शिथिल रही कि इससे संबंधित तमाम पदाधिकारी भी चिर निद्रा में चले गए। वर्त्तमान में स्थिति इतनी विकट है कि झारखंड की अवाम को तमाम परेशानियों को लेकर सीधे मुख्यमंत्री से गुहार लगानी पड़ रही है। यकीन करने के लिए राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सोशल मिडिया के किसी भी प्लेटफॉर्म पर जनता द्वारा लिखे गए कमेंट पढ़ कर, इस त्रासदी का अंदाजा लगाया जा सकता है। 

मसलन, ऐसे में नवनिर्वाचित सरकार को यह मान लेना चाहिए कि पिछली सरकार में तमाम सरकारी तंत्र जंग खा चुकी है। ऐसे में मौजूदा सरकारी तंत्र के खोखलेपन को महसूस करते हुए राजनीतिक तौर पर नए सिरे से चिंतन शुरु कर तंत्र में कैसे बदलाव लाया जाये, रास्ते निकालने पर जोर देना होगा। ताकि झारखंड अवाम की समस्या उनके क्षेत्र में ही आसानी से हल हो सके ।

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