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असम

असम की एनआरसी सूची मे तकरीबन 13 लाख हिन्दू है!

क्या असम में हुए प्रयोग से भी हम कुछ नहीं सीखे ?

आज़ाद-भगतसिंह, अशफ़ाक-बिस्मिल के देश ने आज़ादी के बाद बेरोज़गारी, देशी-विदेशी धन्नासेठों की लूट, आसमान छूती महँगाई व रोज़गार जाते पहली बार देखी हैं। आर्थिक मंदी की आड़ में एक तरफ सार्वजनिक उद्यमों को औने-पौने दामों में बेचा जा रहा है तो दूसरी तरफ गरीब जनता पर टैक्स का पहाड़ लादा जा रहा है। इसके विरोध से बचने के लिए सरकार सीएए और एनआरसी जैसे अपने फ़ासीवादी एजेंडा लागू करने को लेकर एड़ी-चोटी का जोर लगाये  हुए है।

सीएए क़ानून पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश के धार्मिक उत्पीड़ित हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई, पारसी को नागरिकता देगी। मुस्लिम, नास्तिक व अन्य मान्यता वाले इस दायरे से बाहर हैं। असम में लागू एनआरसी की अंतिम सूची के अनुसार करीब 19 लाख लोग नागरिकता साबित नहीं कर पाए, जिसमे तकरीबन 13 लाख हिन्दू है! ये देश के ग़रीब विस्थापित मूलवासी हिन्दू हैं जिन्हें भाजपा नागरिकता देकर हिन्दू मुक्तिदाता बनना चाहती है। 

जबकि एनआरसी क़ानून देश से अवैध घुसपैठियों को बाहर निकालती है, लेकिन असम में हुआ प्रयोग का अनुभव सरकार की मंशा को नंगा करती है। इसमें 1,600 करोड़ रुपये खर्च हुए, चार साल का समय लगा, 52,000 कर्मचारी इस काम में जुटे रहे और हाथ आया 19 लाख लोग अंतिम सूची। कागजों के लिए गरीब काम-धंधे छोड़ दफ्तरों के चक्कर लगाते रहे, रिश्वतें दी और अनगिनत तकलीफ़ें झेली। इस समय लोग डिटेन्शन कैंपों में सड़ रहे हैं, जहाँ कईयों की मौत हो चुकी है।

मसलन, कुल मिला कर एनआरसी का अनुभव नोटबन्दी से भी ज्यादा तकलीफ़देह है। प्रधानमंत्री मोदी और गृहमन्त्री अमित शाह के लाख झूठ बोलने और बयान बदलने के बावजूद यह तय बात है कि एनपीआर की ही अगली कड़ी एनआरसी है। एनआरसी जैसे पागलपन का पहला आधार एनपीआर पर सरकार 3,941 करोड़ 35 लाख का बजट खर्च करने जा रही है। क्या उस राशि को मंदी से उबरने व शिक्षा पर खर्च नहीं किया जा सकता था!

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