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देश जलने को है, रुक कर जन गण मन… गाइए, देश बचाइये 

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सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने पर सबसे पहले सवाल होता है दोष किसका है? जिसका सीधा जवाब है चंद मुट्ठी भर असामाजिक तत्व। इस खेल में फिल्डिंग, गेंदबाज़ी, बल्लेबाजी व अंपायर सभी भूमिकाओं में केवल वही होते हैं। तो क्या यह महज इत्तेफ़ाक है जहां एक तरफ क्षेत्र के हारे नाकाबिल नेता जनता पर आरोप मढ़ रहे हैं कि भारत को हरा दिया…। तो क्या जनता को यह इसलिए मान लेना चाहिए, सबसे ताक़तवर संगठन जिसकी पहुँच मीडिया से लेकर देश के तमाम सरकारी संस्थाओं तक है, उसका मानना है। अगर ऐसा नहीं है तो यह मान लिया जाना चाहिए कि सांप्रदायिक संघर्ष के प्रयास, सत्ता का लाभ ना मिल पाने या सत्ताधारी होकर भी मनचाही मुराद की कहानी न लिख पाने की खीज भर है।

असल में देश के अन्य प्रांतों में हो रही सांप्रदायिक हिंसा को एक नयी जुबान दे दी गयी है। और इस ज़ुबान के अक्स तले एक ऐसी बिसात बिछाने की प्रयास हो रहा है, जहां मौजूदा केन्द्रीय सत्ता को एक बड़े खिलाड़ी के तौर पर मान लिया जाए। और सेक्यूलर मिज़ाज के राजनीतिक दलों के दामन दागदार हो जाए। देश के मौजूदा हालात को पहली बार दंगे या आतंक का नया चेहरा ओढ़ा दिया गया है, जो राजनीति का नया औजार है। नाम जो चाहे दें लेकिन सच तो यही हो चला है कि जहां तंत्र और लोकतंत्र दोनों फेल हैं, वहां सियासत के बदलते रंग के रूप में  दंगे व भीडतंत्र के रूप में नयी परिस्थितियां गढ़ी जा रही है।

वास्तविकता यह है कि देश को बाजार बना चुका है जहाँ रेखाएं दो हैं। एक लुटने वालों की दूसरी लूटने वालों की जहाँ अब बुरा करने, बुरा देखने और बुरा सुनने की परम्परा लगभग गौण हो चुकी हैं। केन्द्रीय राजनीति ने हमारी कमजोर नब्ज़ पकड़ ली है। इसलिए वे हमें आक्रामकता से गृह युद्ध की ओर धकेलने कि जुगत में लगातार भिड़ी हुई है। आज हिंदू मुसलमान की बस्ती जलने पर खुश है तो वहीँ मुसलमान हिन्दू की बस्ती जला कर। लेकिन इस आगजनी के महीन मायने यह है कि देश जल रहा है और हम खुश हो रहे है। यह कैसी राष्ट्रभक्ति है? वक़्त आ गया है कि हम मन में जन गण मन… गायें और खुद के सोच में ठहराव लाते हुए नया भारत गढ़ें।

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