सत्ता का खेल

सत्ता का खेल बिगाड़ जनता किसी एक विपक्ष को सत्ता में बैठा सकती है

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झारखंडी जनता इस बार सत्ता का खेल बिगाड़ते हुए किसी एक विपक्ष को सत्ता में बैठा सकती है

आज झारखंड दुखी हैं, इतने दुखी कि दीवाली की मिठाइयाँ भी उन्हें कड़वी लग रही है। राज्य का कोई भी आम नागरिक समझता है कि राज्य चलाने वालों ने ही उनके पीछे परछाईं की तरह खड़े होकर उनकी ख़ुशियाँ लूटी है, लेकिन सत्ता का खेल देखिये, वह खुद को ऐसे पेश कर रही है कि वह जनता के दुःख से दुखी है। ग़जब की महिमा है राज्य में राज करने वालो की। पांच सालों में आधुनिक अर्थव्यवयवस्था का थर्मामीटर का पारा ऐसा गिरा कि मध्यम वर्ग खुद को ठगा महसूस करने लगे।

इन पांच सालों में इस गुंडागर्दी की वजह से पारा शिक्षक से लेकर आंगनबाड़ी कर्मियों सहित तमाम कर्मियों से लेकर युवाओं की आत्महत्या से लेकर कराहती झारखंडी पेट तक जब आवाज उठाने लगी है। तो अगले ही दिन गलबहिया डाल आशीर्वाद यात्रा के मंच से सत्ता लोकतंत्र का कुछ ऐसा जाप करते दिख रही हैं कि लगता है वाकई इन्होने अपने कर्मों से राज्य को महान बना दिया है। दूसरी तरफ खुले तौर पर राजनीतिक दलों के नेता-विधायको को ख़रीद कर या डरा कर सत्ता जिंदा रखने का प्रयास तेज कर दी। जिससे झारखंड के लोकतंत्र का मतलब खौफ में रहना हो गया,  धर्म का भी ध्रुवीकरण व किसी संकट को दबाने के लिये किसी बडे संकट को खडा करना हो गया है। 

अलबत्ता, मौजूदा वक़्त के परिस्थितियों में त्रासदीदायक सच यही है कि जनता केवल इस लोकतंत्र में टूल बना रह गयी है। विधानसभा में जनता जिसे हराती है, मौजूदा लोकतंत्र उसी हारे हुए को मौका देता है कि जीते को ख़रीद कर खुद सत्ता में बैठ जाओ और सडक पर लिचिंग करने वाले को यह मौका कि हत्या के बाद वह अपनी धारदार पहचान बनाकर सत्ता में शामिल हो जाए। एक और रास्ता है, जनता सत्ता का खेल बिगाड़ कर किसी एक विपक्ष को सत्ता में बैठा सकती है।

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