बरसाती मेढकों की तरह टर्टराने वाली भाजपा से जनता वाकिफ़

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बरसाती मेढकों की तरह टर्टराने वाली भाजपा से जनता वाकिफ़

बरसाती मेढ़कों की एक ख़ास प्रवृत्ति होती है, पूरे साल के सभी दिनों में चुप-चाप भूमिगत रहते है, पर बरसात आते ही अनावश्यक निरंतर टर्टराना शुरू कर देते हैं। कुछ ऐसी ही प्रवृत्ति झारखंड की मौजूदा भाजपा सरकार की भी है, पिछले चार सालों से अपने कर्म और कर्तव्यों से मूँह मोड़कर चुप्पी साधे भूमिगत हो चुके थे, इनके शासन में कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ती रही, गरीब भूखे मरने को मजबूर होते रहे, बच्चियों का सरेआम बलात्कार होता रहा, फिर भी यह सरकार पूरी तरह तमाशबीन बनी रही। परन्तु दिलचस्प बात देखिये चुनावी मौसम आते ही यह दल बेसुरी राग में टर्टराना शुरू कर दिया, एकदम अचानक इन्हें जनता की फ़िक्र होने लगी, कानून व्यवस्था दुरुस्त करने की चिंता सताने लगी।

हाल ही में राँची के सूचना भवन में मुख्यमंत्री रघुबर दास द्वारा आयोजित जनसंवाद कार्यक्रम ‘सीधी बात’ में कुछ ऐसा ही चुनावी आडम्बर देखने को मिला। कहने को तो यह रघुबर दास का जनसमस्याओं के समाधान के  मकसद से मजबूत कदम था, पर इस कार्यक्रम की सार्थकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, इस कार्यक्रम के लिए भाजपा द्वारा किये गए बेहिसाब प्रचार खर्च एवं स्वमहिमामंडन कितना लोकहितार्थ है। दूसरी बात, ऐसा नहीं है कि राज्य में हो रहे हत्या, लूटपाट, बलात्कार, मानव तस्करी जैसे तमाम अपराधिक घटनाएँ, बेरोजगारी, भूखमरी इत्यादि समस्याएं तत्काल उत्पन्न हुई हो, जो अभी-अभी इनकी नींद खुली है। पिछले चार सालो से यह अपनी अजेंडो का प्रसार करती रही और जनता की ज्वलंत समस्याओं पर अपनी आँखों में पट्टी बांधे सत्ता के नशे में मदमस्त खोयी रही।

बहरहाल, जनता के सामने ये स्पष्ट रूप से आ चुका है कि भाजपा जनहित के कार्यों को ‘एक पोलिटिकल एजेंडा’  रूप में बनाकर रखी है, जनता की भलाई के लिए कुछ इनसे तो होता नहीं बस अपने जुमलेरूपी कार्यों का ‘पोलिटिकल मोटिव’ से ढिंढोरा पीटती रहती है। अब 2019 के चुनाव सर पर हैं तो भाजपा के अन्दर का बरसाती मेढ़क फिर से सक्रिय हो गया है, ठीक 2014 की भांति जुमलों की बारिश एवं आपसी सौहार्द को ताक पर रखने के लिए पूरी तरह से तैयारी कर चुकी है। बेफिजूल कागजी विकास का तमाशा करेंगे, जनता की समस्याओं और उनके समाधान, विकास के लिए व्याकुल और समर्पित होने का ढोंग रचेंगे! लेकिन अब आवाम इनके पर्पंचों से वाकिफ़ हो चुकी है। साथ ही यह समझ भी चुकी है की यह दल अपने इन्हीं हथकंडो से सत्ता पर काबिज होने का प्रयास करती है।  और सत्ता पाते ही बरसाती मेढकों की तरह भूमिगत हो अपने मनुवादी विचारों को समाज के बीच प्रतिरोपित करने के एजेंडे पर लग जाती है ताकि इनका तानाशाही राजपाट हमेशा बरकरार रहे।

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