रघुवर सरकार की फैलायी गंदगी से क्यों ग्रसित हो झारखंडी छात्र, सरकार जाएगी सुप्रीम कोर्ट : हेमंत

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भाजपा

नियोजन नीति : बंद एसी कमरों में बयान देने वाले भाजपा नेता क्यों नहीं बताते कि उनके ही दलीलों को सुन हाईकोर्ट ने रखा था फैसला सुरक्षित

22 जनवरी को ही कोर्ट ने ऱखा था फैसला सुरक्षित, रघुवर दास के महाधिवक्ता के दलीलों से शायद हाईकोर्ट भी था असहमत

रांची। 2016 में, भाजपा सरकार द्वारा लागू नियोजन नीति को हाईकोर्ट ने असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया है। जिससे राज्य के 13 अनुसूचित जिलों में नियुक्त 3684 शिक्षकों के भविष्य अधर में लटक गए हैं। कोर्ट का फैसला आने के बाद भाजपा नेताओं ने अपने बंद एसी कमरे से बयान दिया है कि हेमंत सरकार ने झारखंडी छात्रों के हित में अपना पक्ष मजबूती से नहीं रखा।

जिसका अर्थ है कि भाजपा अपनी गंदगी की गठरी राज्य सरकार के मत्थे मढने का प्रयास कर रही है। लेकिन, हक़ीकत भाजपा नेताओं के बयान से परे है। कोर्ट ने 22 जनवरी को ही फैसला सुरक्षित ऱख लिया था। जो साबित करता है कि जितनी कार्यवाही हुई वह रघुवर सरकार में हुई थी। और भाजपा नेताओं द्वारा दिया गया बयान कोरी झूठ के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जिसके लिए वह झारखंड में प्रचलित भी है।

ज्ञात हो कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पूरे प्रकरण में झारखंडी छात्रों को लेकर चिंता जाया है। श्री सोरेन ने साफ़ तौर पर कहा है कि पिछली रघुवर सरकार की ग़लतियोंगलत नीतियों का दंश झारखंडी छात्र क्यों झेले। इसलिए उन्होंने झारखंडी छात्रों के भविष्य को लेकर कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय लिया है। 

जिंदगी दाव पर लगने का कारण केवल एक रघुवर सरकार

दरअसल, पांच साल के दरमियान रोज़गार के नाम पर ठगी करने वाले भाजपा सरकार को झारखंडी छात्रों की कभी चिंता थी ही नहीं। उनकी फूट डालो राज करो विचारधारा वाली राजनीति के लिए जरूरी था कि आदिवासी-मूलवासी युवाओं के समक्ष रोजगार का संकट बना रहे, जिससे उनकी सत्ता के पिपासा को खाद-पानी मिलता रहे। इसलिए, भाजपा द्वारा ऐसा बयान देना उनके विचारधारा के अनुरूप जायज है, लेकिन, आश्चर्य तब होता है जब बाबूलाल जी के मुख से भी ऐसे न पचने वाला बयान निकलते हैं।

भाजपा नेताओं को इसे न कबूलने के पीछे का डर तो फिर भी समझा जा सकता है कि झारखंडी छात्र-छात्राओं के दांव पर लगी जिंदगी का कारण उसकी रघुवर सरकार है। लेकिन, विपक्ष में रहते हुए रघुवर सरकार के खिलाफ गला फाड़ने वाले बाबूलाल जी का सुर क्यों भाजपा में आते ही बदल गया यह समझ से परे है। क्या सत्ता का लोभ ने उनकी विचारधारा का नैतिक पतन तो नहीं कर दिया है। क्योंकि सच्चाई यह है कि कोर्ट ने केवल हेमंत सरकार के दौर में फैसला सुनाया है। 

भाजपा की रघुवर सरकार के दलीलों को सुनने बाद ही फैसले को कोर्ट ने सुरक्षित रखा था

ज्ञात हो कि हाईकोर्ट ने 22 जनवरी 2020 को ही नियोजन नीति को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की थी। तत्कालीन सरकार के महाधिवक्ता अजीत कुमार और प्राथी की दलीलों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने फैसले को सुरक्षित रखा था। तारीख गवाह है कि ठीक उसके 24 दिन पहले ही हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। यानी भाजपा की दलील केवल राज्य में भ्रम फैलाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं।  

रघुवर के महाधिवक्ता ने बताया था नियोजन नीति को विधि सम्मत, जबकि प्राथी ने असंवैधानिक

रघुवर सरकार के महाधिवक्ता रहे अजीत कुमार ने सरकार की ओर से कोर्ट को दलील दिया था कि सरकार की नियोजन नीति पूरी तरह से विधि सम्मत है। अधिसूचित जिलों में रहने वाले स्थानीय निवासियों के शैक्षणिक, सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान को ध्यान में रखते हुए उक्त अधिसूचना जारी की गई है। नीति के तहत स्थानीय निवासियों के लिए तृतीय एवं चतुर्थवर्गीय पदों के लिए पूरा आरक्षण दिया जाना कानून सम्मत है। 

वहीं प्रार्थियों की ओर से रघुवर सरकार के नियोजन नीति के विरुद्ध कोर्ट में दलील दिया गया था कि सरकार द्वारा बनायी गयी नियोजन नीति असंवैधानिक और समानता के अधिकार के खिलाफ है। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

पंचायत सचिव के सफल अभ्यर्थियों का डाक्यूमेंट्स वेरीफिकेशन सिंतबर 2019 में ही हो गया था, फिर रघुवर सरकार ने क्यों नहीं दी नियुक्ति

भ्रम व फासीवादी विचारधारा की राजनीति करने वाले भाजपा नेताओं को बताना चाहिए कि पंचायत सचिव नियुक्ति हेमंत सरकार ने नहीं बल्कि उनकी भाजपा सरकार ने रोकी थी। भ्रम फैलाने वाले भाजपा को जनता को यह बताना कि कोर्ट का फैसला आए अभी महज 4 दिन ही हुए हैं। जबकि सफल अभ्यर्थियों का डाक्यूमेंट्स वेरीफिकेशन सितंबर 2019 (रघुवर सरकार के समय) ही हुआ था। यह वक़्त राज्य में चुनाव के लिए लगने वाले आचार सहिंता 1 नवंबर से दो माह पहले की थी। 

यानी उनके पास नियुक्ति के लिए सितम्बर व अक्टूबर 2019 माह का समय था। फिर भी उन्होंने नियुक्ति नहीं किया। और अब अपनी ज़मीन बचाने के लिए भाजपा नेताओं द्वारा न केवल सफल अभ्यर्थियों के नियुक्ति को लेकर सफ़ेद झूठ बोला जाना और भ्रम भी फैलाना साबित करता है कि न तो उस वक़्त के रघुवर सरकार को झारखंडी छात्र-छात्राओं की चिंता थी और न ही अब खुद को ईमानदार विपक्ष बताने वाले भाजपा व उसके नेताओं को ही चिंता है।

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