पेगासस मामला केवल जासूसी भर नहीं बल्कि व्यक्तिगत आज़ादी पर भयावह सरकारी हमला 

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पेगासस मामला

देश में जर्नलिस्टों की जासूसी अचम्भित करने वाला मुद्दा नहीं है. सरकारें इस तरह के काम करती हैं. लेकिन मोदी सत्ता मामला और गंभीर हो गया है. फादर स्टेन स्वामी की बलि इसका ताजा उदाहरण हो सकता है. लोकतंत्र के नाम पर भारत में जो कुछ हो रहा है, वह जासूसी से आगे की बात है. इज़राइली कंपनी NSO की पेगासस सॉफ्टवेयर से सरकारों द्वारा केवल जासूसी नहीं हो रही, आपके फोन को क़ब्ज़े में लिया गया है. आपके फोन का इस्तेमाल हो रहा है. जहाँ वह आपके फोन से मैसेज भेज सकता है, ईमेल का रिप्लाई कर सकता है, फोटो-वीडियो ही नहीं ले सकता है, निजी पल को लाइव देख रिकॉर्ड कर सकता है. यह व्यक्तिगत आज़ादी पर भयावह हमला है.

फॉरबिडन स्टोरीज़ और एमनेस्टी इंटरनेशनल को 50,000 से अधिक फोन नंबरों की सूची मिली

पेरिस के मुनाफेरहित पत्रकारिता संस्था फॉरबिडन स्टोरीज़ और एमनेस्टी इंटरनेशनल को 50,000 से अधिक फोन नंबरों की सूची मिली है. जिसकी निगरानी की गई है और की जाने वाली थी. 1000 के आस-पास फोन नंबर की जांच की जा सकी है. एमनेस्टी ने अपने फोरेंसिक लैब में नंबरों की जांच की और दुनिया भर के 15 समाचार संगठनों से साझा किया. इस सूची में भारत, अज़रबैजान, बहरीन, कजाकिस्तान, मेक्सिको, मोरक्को, रवांडा, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के लोगों के फोन नंबर हैं. भारत में दि वायर ने इस पर खोजी काम किया है.

अमेरिका में दि वाशिंगटन पोस्ट, PBS Frontline. ब्रिटेन में द गार्डियन. फ्रांस में लां मोंद, रेडियो फ्रांस. जर्मनी के प्रतिष्ठित अखबार ज़्यूड डॉयचे साइटुंग, और डी ज़ाइट में छपा है. बेल्जियम के ले स्वा और नैक और इज़राइल के ह-आरेज़ में भी छपा है. लेबनान, हंगरी और मेक्सिको के अखबार में भी यह खबर छपी है. भारत में दि वायर पैगासस प्रोजेक्ट में शामिल है. बाकी कई अखबारों ने खबर को आधा अधूरा ही छापा है. हालांकि हिन्दी अख़बारों और भारतीय अखबारों में खबर को प्रमुखता से छापना चाहिए था. क्योकि यह पर्दाफाश केवल भारत की सरकार के बारे में नहीं, 50 देशों के फोन नंबरों के बारे में है. 

फ़्रांस में पेगासस जासूसी मामले की जांच के आदेश लेकिन भारत में क्यों नहीं?

फ़्रांस के कानून महकमे के अधिकारियों ने पेगासस जासूसी की जांच के आदेश दे दिए हैं. लेकिन भारत में ऐसा कुछ क्यों नहीं हो रहा? अगर मान लिया जाए कि पेगासस जासूसी कांड में भारत सरकार या एजेंसियों की संलिप्तता नहीं है फिर भी क्या भारत सरकार को चिंता नहीं होनी चाहिए कि देश के बेहद महत्वपूर्ण नागरिकों के जीवन में घुसपैठ हुई है? आखिर कौन है जो विपक्ष का ही नहीं सरकार के मंत्रियों की भी जासूसी करा रही है? आखिर क्यों भारत सरकार के लिए यह मुद्दा  संजीदा नहीं है? लेकिन मामले में भारत सरकार का रुख़ आधिकारिक तौर पर लापरवाही भरा होना संदेहास्पद है. गृह मंत्री अमित शाह के द्वारा मुद्दे में क्रोनोलॉजी समझाना महत्वपूर्ण सवाल उठा रहे हैं.

भारत सरकार को पेगासस मामले की सच की चिंता क्यों नहीं? 

मॉनसून सत्र के ठीक पहले बीजेपी के कद्दावर मुख्यमंत्रियों का पेगासस जासूसी के आरोपों का जवाब देने में लगा दिया जाने से साफ़ है कि सरकार को पेगासस के सच की चिंता नहीं है. तमाम कवायदों के अक्स में केवल यही प्रतीत होता है कि लोगों तक संदेश न जाए कि सरकार जासूसी करा रही है. लेकिन सच यह है कि सरकार अपनी जगहंसाई ही करा रही है. दुनिया को मालूम है कि सत्रह मीडिया समूहों की साझा टीम जांच कर रही है. यह एक देश के ख़िलाफ़ साज़िश का मामला नहीं है, बल्कि कई सरकारों की अपनी ही जनता के प्रति साज़िश का पर्दाफ़ाश करने का मामला है. 

दरअसल, यहीं से संदेह पैदा होता है कि सरकार जांच नहीं चाहती. क्योंकि मामले में सूची बड़ी होती जा रही है. कर्नाटक के भी कुछ नेताओं के फोन नंबर हैक किए जा रहे थे. यह इत्तेफाक नहीं हो सकता कि तमाम मामलों में हैक फोन नंबर का सम्बन्ध पिछले दो-तीन साल की राजनीति और सम्बंधित विवादों से है. जिसका लाभ भाजपा को मिला है. हालांकि इसके काट में भाजपा जाना-पहचाना तरीक़ा अपना रही है. जहाँ पेगासस जासूसी का सच बाहर निकालने वाले पत्रकारों को अन्य मामलों में फंसाया जा सकता है. भीमा कोरेगांव और दिल्ली दंगे इसकी डरावनी हकीकत हैं

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