झारखंडी संस्कृति की जीवनशैली

महिला सुरक्षा आदिकाल से झारखंडी संस्कृति की जीवनशैली

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झारखंडी संस्कृति की जीवनशैली

  • मानव तस्करी की शिकार बच्ची, जिसे हेमंत सरकार एयरलिफ्ट कर रांची लायी थी।
  • ब्रेन मैपिंग कर सरकार उसके भविष्य की योजना को भविष्य गढ़ने में जुटी।
  • सिंगरी जैसी ही 44 अन्य बेटियां हैं, जिनकी ब्रेन मैपिंग व मनोवैज्ञानिक जांच की गयी।

झारखंड का पूरा कैनवास आदिकाल से ही जीवन व अधिकार की रक्षा के प्रति समर्पित है। यहाँ के धुल-कण तक में अपनी समाजिक अधिकार की रक्षा को लेकर चेतना व्याप्त है। महिलाओं की रक्षा व उनके अधिकार के प्रति सजगता इस प्रदेश की संस्कृति ही नहीं जीवन शैली रही है। झारखंडी संस्कृति की जीवनशैली में महिला सुरक्षा को लेकर सवेदनशीलता है। यही कारण है कि इस राज्य को आन्दोलन की धरती कहा जाता है, जहाँ लोग सामाजिक हित में अपनी शहादत देने से नहीं चूकते।  

ज्ञात हो राज्य की पिछली भाजपा की डबल इंजन सत्ता महिला उत्पीडन के मद्देनज़र ही जनता के कोप भाजन बनी। और शायद मौजूदा दौर में झारखंडी मुख्यमंत्री के महज एक वर्ष के कार्यकाल में, सैकड़ों बेटियों को लूटेरों के चंगुल से रेस्क्यू कर वापस लाने की जुझारू रणनीत भी इस जीवनशैली का हो सकता है। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने से लेकर बेटियों की शिक्षा तक में उठाये गए ठोस कदम भी। गौर करें तो पायेंगे कि इस सरकार की शासन व्यवस्था व फैसले राज्य की जल-जंगले-ज़मीन, महिला, पर्यावरण व सामाजिक रक्षा से सने रहे। जो निश्चित रूप से झारखंडी संस्कृति की जीवनशैली का चमकदार आईना है।  

परमेश्वर माझी ने पत्नी की इज़्ज़त के ख़ातिर जान देकर साल 1971 को अमर कर दिया

झारखंड का इतिहास हमेशा से महिला सुरक्षा की भावना उच्च कोटि की रही है। राज्य के महापुरुषों की शहादत तथ्यों की गवाही भी देती है। परमेश्वर माझी जिसने जान देकर पत्नी की इज्जत बचाते हुए झारखंड के साल 1971 को अमर कर दिया। कोयलांचल में माफिया-ठेकेदारों और खदान मालिकों के विरुद्ध मज़दूर अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहे थे। जिसके तहत वे जुल्म के शिकार हो रहे थे, पुलिसिया जुल्म अपने चरम पर था। उस वक़्त तक दिशुम गुरु शिबू सोरेन का प्रवेश गिरिडीह में हो चुका था। उनकी विनोद बिहारी महतो और एके राय से वैचारिक सम्बन्ध बन चूका था। इन्होंने मजदूरों को एकजट करते हुए शोषण के खिलाफ लड़ना शुरू कर दिया था।

इसी  बीच धनबाद के पूर्वी बरवा के खडिकाबाद गाँव में एक घटना घटी। एक गरीब आदिवासी परमेश्वर माझी मजदूरी कर अपने परिवार के लिए रोजी-रोटी जुटाता था। उस दिन भी मजदूरी की तलाश में बाहर गया। दोपहर का समय था, घर में उसकी जवान पत्नी अकेली थी। वहाँ से होमगार्ड के जवान हमेशा दौरा पर रहते थे। चार जवान की नजर परमेश्वर की युवा पत्नी पर पड़ी। वे उसकी झोंपड़ी में घुस गए और उस महिला के साथ दुष्कर्म करने का प्रयास करने लगे। बचाव के  प्रयास में उसकी बेबस चीख बाहर आ रही थी। 

होमगार्ड के जवानों ने परमेश्वर को खुद पर भारी पड़ता देख, गोली चला दी…

काम न मिलने के कारण परमेश्वर हताश, भूखा-प्यासा घर लौट रहा था। उसने अपनी पत्नी की चीख-पुकार सुनी। वह घबराया हुआ दौड़ते हुए घर में प्रवेश किया। देखा कि चार जवान उसकी पत्नी के साथ दुष्कर्म की कोशिश में है। वह पत्नी के बचाव में अकेले चारो जवानों से भीड़ गया। होमगार्ड के जवानों ने खुद पर परमेश्वर को भारी पड़ता देख, उसपर गोली चला दी। परमेश्वर माझी उसी जगह पत्नी की इज्जत बचाते हुए शहीद हो गया। होमगार्ड के जवान भाग गए। 

इस घटना के बाद दिशोम गुर व विनोद बाबू सरीखे लोगों के स्मृति पर गहरा घाव छोड़ा। यही वह दौर था जब इन्हें लगा कि केवल सामाजिक संगठन के बल पर अत्याचार से नहीं लड़ा जा सकता है। और सशक्त राजनीतिक संगठन की आवश्यकता महसूस हुई। फिर बिनोद बाबू, ए के राय और शिबू सोरेन ने बुद्धिजीवियों के संग मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन पर किया। 

मसलन, हेमंत सोरेन में बेटी, बहन व माँ के अधिकार व सुरक्षा प्रदान की ललक, एक मुख्यमंत्री के कर्तव्य से अधिक झारखंडी जीवन शैली से प्रेरित प्रतीत होता है। शायद यही वजह है कि चाहे एक बेबस बहन की अपने पिता के अंतिम संस्कार करने की दुखभरी आवाज हो, बाहर मानव तस्करों की चंगुल फंसी दुखियारी बेटियों की विलाप हो, या ठण्ड में बूढ़ी माँ का ठिठुरन हो। हेमंत तक सभी की पुकार पहुंची और उन्होंने राजनीतिक विवशता से परे जा कर उनतक मदद के हाथ पहुंचाए। कोई भी झारखंडी अपने मातृभूमि की ऐसी गौरवमयी जीवनशैली पर नाज कर सकता है।

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