गोबर की सांस्कृतिक ज़मीन को गोयठे की चुनौती

गोबर की सांस्कृतिक ज़मीन को गोयठे की चुनौती

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गोबर की सांस्कृतिक विरासत जब मौजूदा सत्ता की उस हकीकत के साथ खड़ा हो जाए। जिसका सच गरीब भारत की लूट के आसरे बाजारवाद का बढावा देना हो। जहाँ किसानों की दुगने आय का अक्स उसकी ज़मीन लूट से जा जुड़े। जहाँ गरीब भारत को ध्यान में रखकर बनायी गयी उसकी नीतियां गरीबी दूर न कर गरीबों को ही दूर करे। तो गोयठा पर जीवन यापन करने वाली ग्रामीण भारत से स्वयं सेवक संघ की उस सांस्कृतिक थ्योरी को चुनौती तो मिलेगी। जिसके अक्स में 23 जुलाई 1955, को भारतीय मज़दूर संघ और 4 मार्च 1979, को भारतीय किसान संघ का गठन किया गया हो। 

मौजूदा दौर में भारतीय मज़दूर संघ का सच

सवाल है कि 23 जुलाई 1955 लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के जन्मदिवस पर, दत्तोपन्त ठेंगड़ी के अगुवाई में, भारतीय मज़दूर संघ का गठन का सच क्या है? क्या वह मौजूदा दौर में गरीब भारत के आसूओं के साथ खड़ा है? जवाब कोई भी सड़क नापता मज़दूर दे देगा, नहीं उसकी सहमती तो केन्द्रीय सत्ता के साथ है। और उस सत्ता का सच, उसकी बुनियाद खनिज संसाधनों से लेकर खेतिहर ज़मीन, अनाज और बाकि माद्यमों पर टिकी इकॉनमी की लूट पर टिकी है।

इस संगठन का गठन अन्य श्रम संगठनों की तरह शोषित मज़दूरों के जुसे सरोकारों के कैनवास पर खड़ा नहीं हुआ। सांस्कृतिक विचारधारा की ज़मीन एक मानसिकता पर खड़ी इमारत है। तो मान लें, उस विचारधारा का सत्ता के साथ खड़ा होना ही उसकी असल सच है। और दुनिया के मज़दूरों एक हो के जगह मज़दूरों दुनिया को एक करो का सच मज़दूर समझने लगे है। जाहिर है समझ तो हैं तभी तो झारखंड जैसे खनिज बाहुल्य ज़मीन से उस सत्ता को सिरे से खारिज कर दिया जाता है। 

भारतीय किसान संघ जिसका लक्ष्य था भारतीय किसानों का समग्र विकास

भारतीय किसान संघ जिसका लक्ष्य भारतीय किसानों का समग्र विकास है। इसकी स्थापना भी  दत्तोपन्त ठेंगड़ी ने 4 मार्च 1979 को राजस्थान के कोटा शहर में की। जिसके सरोकार भारतीय किसानों के उत्थान से जुड़ा बताया जाए। और कोरोना त्रासदी भी केवल कृषि को ही देश का फ़ायदेमंद उद्योग का सच उभारे। जिसके अक्स में मुनाफ़े के मद्देनज़र सरकारी नीतियाँ पूंजीपतियों को ग्रामीण किसानों को रौंदने की ताक़त मुहैया करे। और किसान संघ की सारी थ्योरी उसी सरकार को लोकतंत्र का जामा पहनाये। तो संगठन के अस्तित्व पर सवाल उठेगें। और उस संगठन को किसान की चुनौती मिले तो आश्चर्य क्यों?

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