देवघर एम्स

देवघर एम्स का उदघाटन टलना निशिकांत दूबे व बीजेपी नेताओं के तानाशाही को दर्शाता है

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देवघर एम्स के उदघाटन के साथ संताल परगना के आदिवासी समाज समेत तमाम वोर्गों को तत्काल मिल सकती थी बेहतर चिकित्सीय सुविधा. खुद को आदिवासी नेता बताने वाले बाबूलाल मरांडी का मामले में चुप्पी गंभीर सवाल खड़े करते हैं

कोरोना संक्रमण में वर्चुअल कार्यक्रम पर बनी थी सहमति, लेकिन एक व्यक्ति के अहम ने झारखंडी जनता के अधिकार छीने

रांची : आखिर वही हुआ, जिसका अंदेशा हर गैर भाजपा शासित राज्यों को अक्सर होता है. मोदी सरकार, बीजेपी नेताओं के तानाशाही रवैया व व्यक्ति विशेष के अहम ने, संताल परगना सहित सीमा से सटे बिहार के कुछ जिलों के गरीब, दलित, आदिवासी समाज के लोगों को तत्काल मिलने वाली बेहतर चिकित्सीय सुविधा से दूर कर दिया है. इसके लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से आग्रह था कि जल्द देवघर एम्स की OPD सुविधा शुरू हो. 

ज्ञात हो, केंद्रीय मंत्रालय द्वारा 26 जुलाई की तिथि निर्धारित करते हुए, देवघर एम्स के उदघाटन कार्यक्रम को स्वीकृति प्रदान किया गया था. लेकिन हुआ वही, जो सुनियोजित था. गोड्डा सांसद निशिकांत दूबे के अहम, केंद्र व बीजेपी के बड़े नेताओं के तानाशाही रवैये में देवघर एम्स के ओपीडी उदघाटन कार्यक्रम अपरिहार्य कारणों से स्थगित हो गया. 

आदिवासी समाज के हितैषी बताने वाले बाबूलाल मामले में क्यों चुप हैं?

कथिति तौर पर, भाजपा सांसद निशिकांत दूबे ने अपने अहम के पराकाष्ठा में देवघऱ एम्स के उद्घाटन कार्यक्रम को टलवा दिया है. जिसका परिणाम संताल परगना के सीधे-साधे आदिवासी समाज समेत सामान्य गरीब झारखंडी जनता को झेलना पड़ा है. ज्ञात हो संताल परगना के दबे-कुचले आदिवासी व सामान्य गरीब कई वर्षों से क्षेत्र में, बेहतर इलाज हेतु एम्स की मांग कर रहे थे. उद्घाटन के साथ ही उनका सपना सच होने वाला था. लेकिन मनुवादी मानसिकता के संकुचित विचारधारा के मद्देनजर फिर एक बार उन्हें उनके अधिकारों से वंचित होना पड़ा है.

राज्य की सत्ता दल, झामुमो के महा सचिव के द्वारा सांसद निशिकांत दूबे पर सुनियोजित तरीके से उदघाटन कार्यक्रम को रद्द कराने का गंभीर आरोप लागाया गया है. ऐसे में सवाल महत्वपपूर्ण सवाल यह हो चला है कि खुद को आदिवासी हितैषी, आदिवासी समाज का शुभचिंतक बताने वाले बाबूलाल मरांडी क्यों खामोश हैं? झारखंड के गरीबों के पक्ष में आज उनकि अभिव्यक्ति क्यों असमर्थ हो चली हैं?

लॉकडाउन के नियमों का पालन भर ही तो करना चाहते थे जिलाधिकारी, निशिकांत नियम तोड़ने पर क्यों दिखे आमादा ?

विवाद की असल वजह निशिकांत दूबे का कार्यक्रम को वर्चुअल नहीं बल्कि फिजिकल कराने की मंशा को माना जा रहा है. देवघर डीसी मंजूनाथ भजंत्री तो केवल कोरोना के नियमों के निर्देशों का पालन भर करना चाहते थे. जिससे संक्रमण के फैलाव को राज्य में रोका जा सके. मसलन, उन्होंने उदघाटन कार्यक्रम को वर्चुअल ऑनलाइन संपन्न कराना चाहा. वर्चुअल कार्यक्रम में मुख्यमंत्री, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री व  अन्य जनप्रतिनिधियों को जुड़ना था. लेकिन पूर्व की तरह इस बार भी गोड़्डा सांसद के तानाशाही मासिकता को यह नहीं भाया. वह फिजिकल कार्यक्रम कराना चाहते थे. ज्ञात हो, गोड्डा रेलवे स्टेशन से हमसफर ट्रैन की शुरूआत में भी निशिकांत डूबे ने मर्यादा को तोड़ते हुए कार्यक्रम को हिंसक बनाया था.

पावर का धौंस में जनहित कार्यक्रम का रद्द करना क्या ठीक हो सकता है? 

स्थानीय सांसद निशिकांत दूबे ने एक बार फिर अपने पावर को धौंस के रूप में प्रयोग किया है. जिसके अक्स में केंद्र ने कल्याणकारी उदघाटन कार्यक्रम को रद्द कर दिया. यह तय है कि केवल एक सांसद की इच्छा भर से महत्वपूर्ण कार्यक्रम रद्द नहीं हो सकता. बल्कि प्रदेश बीजेपी के कई बड़े नेताओं समेत केंद्र की मिलीभगत से ही संभव हो सकता है. यह राजनीति का कैसा उदाहरण हो सकता है जहाँ राज्य की गरीब जनता तानाशाही रवैये की भेंट चढ़ जाए. मसलन, तमाम परिस्थितियों के मद्देनज़र यह राज्य के लिए अघोषित आपातकाल ही हो सकती है.

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