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भाजपा के साढ़े छह साल के कार्य काल में जनता के 6 बड़े आंदोलन देश ने देखा

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भाजपा के साढ़े छह साल के कार्य काल में जनता के 6 बड़े आंदोलन देश ने देखा, जो मोदी सरकार की नींव हिलाने के लिए काफी हैं!

रांची। केंद्र की सत्ता में बैठी मोदी सरकार 2014 से लेकर अबतक खुद को किसान हितैषी बताने का दावा करती रही है। जनवरी 2019 में आयोजित भारतीय विज्ञान कांग्रेस के सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दिये नारे ‘’जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान’’ से तो इसी बात का संकेत मिलता है। हालांकि इस दावे को किसानों ने सिरे से खारिज किया है।

पिछले साढ़े छह सालों में केंद्र के खिलाफ जितने भी आंदोलन हुए है, उसमें सबसे बड़ी भूमिका किसानों ने ही निभायी है। किसानों ने कई बार मोदी सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर कर आंदोलन का रास्ता अपना चुके हैं। ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार की नीतियों से केवल देश के किसान ही परेशान हैं। विरोध करने वालों में देश की आबादी में बड़ी भूमिका रखने वाले विभिन्न संगठन यथा मजदूर संगठन (खनन, कोयला क्षेत्र में) सरकारी कर्मी (बिजली व रेलवे व एलआईसी) सहित अल्पसंख्यक समाज के लोग भी मुख्य रूप से शामिल हैं। 

मसलन, भाजपा के साढ़े छह साल के कार्य काल में मोदी सरकार के जनविरोधी नीतियों के खिलाफ अब तक कुल छह बड़े आंदोलन हो चुके है, जिसे देश ने शिद्दत से स्वीकारा भी है। जो मोदी सरकार की नींव को हिलाने के लिए काफी है। 

मोदी सरकार के खिलाफ पांच बार किसान खोल चुके हैं मोर्चा

मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने का काम सबसे पहले देश के किसानों ने किया था। अबतक किसानों ने अपने संगठन के माध्यम से मोदी सरकार के खिलाफ 5 बार मोर्चा खोला है। 

  • जनवरी 2015 में भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव के लिए लाए अध्यादेश के खिलाफ किसान सड़कों पर उतरे थे। लोकसभा से पास होने के बाद भी किसानों के उग्र होते आंदोलन को देख मोदी सरकार को बैकफुट में आना पड़ा था। 
  • साल 2017 में तमिलनाडु के किसान मोदी सरकार से कावेरी प्रबंधन बोर्ड के गठन की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर महीनों धरने पर बैठे थे। बोर्ड गठन की मांग कर्ज माफी, सूखा राहत पैकेज और सिंचाई संबंधी समस्या के समाधान के लिए भी थी। यहां तक की इन किसानों ने अर्धनग्न होकर प्रदर्शन करने से लेकर अपना मलमूत्र तक पीया था। 
  • अक्टूबर 2018 को भारतीय किसान यूनियन के नेतृत्व में हजारों किसानों ने हरिद्वार से लेकर दिल्ली तक पैदल ‘किसान क्रांति यात्रा’ निकाली थी। किसानों की मांग गन्ना बकाया से लेकर स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू करना था। 
  • नवंबर 2018 को अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के बैनर तले किसानों से जुड़े 208 जनसंगठनों के किसानों ने रामलीला मैदान से संसद मार्च तक विशाल रैली निकाली थी। इसके जरिए देश भर के किसान मोदी सरकार तक अपनी बातें पहुंचाना चाह रहे थे। 
  • नवंबर 2020 में भी किसान व उनके संगठन मोदी सरकार के लाए तीन कृषि कानून के विरोध में आंदोलनरत है। छठी दौर के वार्ता के बाद भी कोई निष्कर्ष सामने नहीं आया है। 

सरकारी कर्मियों सहित मजदूरों ने भी मोदी नीतियों के खिलाफ उतरे सड़क पर

केवल किसान ही मोदी सरकार की जन विरोधी नीतियों से परेशान नहीं है। कई सरकारी विभागों के कर्मियों व मजदूरों ने भी केंद्र के नीतियों से असहमति जताते हुए अपना विरोध प्रदर्शन किया हैं। 

कॉमर्शियल माइनिंग के खिलाफ खनन क्षेत्र के मजदूरों ने किया विरोध

आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत केंद्र ने जैसे ही कमर्शियल माइनिंग की इजाजत दी, उसके बाद से ही कोयला उद्योग में सक्रिय मजदूर संगठन विरोध पर उतर आये। मजदूर संगठनों का मानना है कि इसके बहाने केंद्र की मोदी सरकार कोयला उद्योग को निजीकरण की राह पर ले जा रही है। केंद्रीय श्रमिक संगठन एटक, सीटू, इंटक, एचएमएस के साथ ही बीएमएस ने भी कमर्शियल माइनिंग के खिलाफ में आवाज बुलंद की। उनका मानना था कि मोदी सरकार की इन नीतियों से करोड़ मजदूरों प्रभावित होंगे।

रेलवे के निजीकरण के विरोध में यूनियन ने किया धरना प्रदर्शन

रेलवे के निजीकरण के विरोध में सभी जोन के यूनियन ने तो मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलन किया। नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे एम्पलाइज यूनियन ने तो रेल बचाओ-देश बचाओ अभियान तक चलाया। यूनियन का कहना था कि केंद्र के निजीकरण का फायदा न देश को होगा न ही आम जनता को। बल्कि इससे केवल विदेशी कंपनियों और कुछ पूंजीपतियों को देश की संपदा हस्तांतरित करने की तैयारी है। 

एलआईसी के निजीकरण से नाराज 1 लाख से अधिक कर्मी उतरे सड़क पर

भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के निजीकरण करने की पहल का भी इस जुड़े एक लाख से अधिक कर्मियों ने विरोध किया। बता दें कि वर्तमान में पूरे देश में एलआईसी से 42 करोड़ लोग जुड़े हुए हैं। निजीकरण से इनपर नकारात्मक असर पड़ना तय होगा।

बिजली विभाग के निजीकरण की शुरूआत उत्तरप्रदेश के 15 लाख कर्मियों ने कर दिया

इन दिनों उत्तरी भारत के सभी राज्यों में कार्यरत बिजली कर्मी भी निजीकरण के खिलाफ आक्रोशित हैं। ऐसे कर्मी मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलन की तैयारी में है। पिछले दिनों उत्तरप्रदेश में बिजली विभाग के निजीकरण को लेकर राज्य में 15 लाख से अधिक कर्मी हड़ताल पर चले गये थे।

संशोधित सीएए के खिलाफ शाहीन बाग विश्व में बना चर्चा का विषय

संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के खिलाफ आक्रोश का ही परिणाम था कि बीते साल दिल्ली के शाहीन बाग पूरे विश्व में चर्चा का विषय बना। अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े करोडो लोगों ने एकजुटता का परिचय दे मोदी सरकार की नीतियों का विरोध किया।

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