आखिर कब तक भाजपा की गलत नीतियों का परिणाम भुगतते रहेंगे झारखंडी : बड़ा सवाल

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रघुवर

रघुवर दास के पांच सालों की गलत शासन प्रणाली का लगातार खुल रहा पोल 

रघुवर सरकार की नियोजन नीति का दुष्परिणाम सीधा भुगतेंगे झारखंडी आदिवासी-मूलवासी

राँची। सोमवार 21 सितम्बर, झारखंड हाइकोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले ने रघुवर सरकार द्वारा बनायी गयी नियोजन नीति 2016 को रद्द कर दिया है। यह स्पष्ट है कि हाइकोर्ट के इस फैसले का असर झारखंड के आदिवासी-मूलवासी जनता पर सीधा पड़ेगा। 

रघुवर सरकार द्वारा बनायी गयी इस नियोजन नीति में राज्य के सभी जिलों को अनुसूचित और गैर अनुसूचित जिलों में बांटा गया था। कहा गया था कि अनुसूचित जिलों की नौकरी में सिर्फ उसी जिले के निवासियों (जाहिर है कि वे झारखंड के होंगे) का ही नियुक्त किया जा सकता है। 

जाहिर है, हाइकोर्ट के फैसले के बाद इस नीति के तहत शिक्षक बने सभी झारखंडी अभ्यर्थियों की नौकरियों पर खतरा मंडराने लगा है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब भाजपा की गलत नीतियों का शिकार झारखंडी जनमानस को होना पड़ा है। पहले भी कई बार डबल इंजन सरकार के गलत नीतियों के परिणाम झारखंडवासियों को भुगतना पड़ा हैं। 

मनमाने व तानाशाह तरीके से रघुवर सरकार में ली गयी थी संयुक्त स्नातक परीक्षा की अधियाचना वापस

राज्य की पिछली रघुवर सरकार की गलत नीतियों की मार बीते 9 जुलाई 2018 को झारखंडी छात्र संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा में झेल चुके हैं। ज्ञात हो कि झारखंड कर्मचारी चयन आयोग ने 2015 में 1150 पदों पर नियुक्ति के लिए एक विज्ञापन निकाला था। जिसकी प्रारंभिक परीक्षा 21 अगस्त 2016 को ली गयी थी। और उसका परिणाम (रिजल्ट) 25 अक्तूबर 2016 को जारी किया गया था। लेकिन, बाद में 18 जनवरी 2017 को रघुवर सरकार द्वारा मनमाने तरीके से उस अधियाचना वापस ले लिया गया।

जेपीएससी परीक्षा को तो रघुवर सत्ता ने गर्त में ही पहुंचा दिया, हेमंत ने किया इंसाफ

रघुवर दास की गलत नीतियों के परिणाम से झारखंड लोक सेवा आयोग भी अछूता नहीं रहा। सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे झारखंडी अभ्यर्थियों ने भी भुगते हैं इनके गलत नीतियों के परिणाम। उस सरकार ने तो आयोग द्वारा ली जाने वाली सिविल सेवा परीक्षा को पूरी तरह से गर्त में पहुंचा दिया। जिसका जीता जागता साक्ष्य यह है कि रघुवर सरकार द्वारा पांच साल के कार्यकाल में एक भी सिविल सेवा परीक्षा आयोजित नहीं करवा पाना। विकास के खोखले नारों के बीच झारखंडी युवाओं को केवल धोखे ही मिले। 

ऐसा ही हाल छठी सिविल सेवा परीक्षा की भी रही। निकाले गए विज्ञापन से परे जाकर रघुवर सरकार ने प्रारंभिक परीक्षा में ही 36000 अतिरिक्त रिजल्ट जारी कर दिया। जिससे नाराज़ झारखंडी मूलवासी-आदिवासी छात्र-छात्राएं सड़कों पर धऱने देने को मजबूर हुए। लेकिन, सत्ता के घमंड में चूर सरकार ने तानाशाही तरीके से उनके मांगों अनसुना कर दिया। हालांकि, झारखंड के छात्रों को हाइकोर्ट और हेमंत सरकार के कार्यप्रणाली से कुछ राहत जरुर मिली है। 

ज्ञात हो कि मुख्यमंत्री बनते ही हेमंत सोरेन ने न केवल छठी सिविल सेवा का फाइनल रिजल्ट प्रकाशित किया, बल्कि झारखंड में पांच साल से रूकी परीक्षा को क्लियर कर झारखंडियो को रोज़गार भी दिलाया।  

सहायक पुलिसकर्मियों को भूखों मरने छोड़ गयी डबल इंजन सरकार, हेमंत सरकार से राहत मिलने की उम्मीद

राजधानी के मोरहाबादी मैदान में सहायक पुलिसकर्मी अधर में फंसे अपने भविष्य को लेकर कई मांगों के साथ कई दिनों से डटे हैं। इन पुलिसकर्मियों के इस स्थिति के गुनेहगार भी और कोई नहीं केवल रघुवर सरकार ही है। दरअसल, कम मानदेय पर काम लेने की संकुचित मंशा वाली रघुवर सरकार में इनकी नियुक्ति संविदा पर आधारित थी। जो भविष्य में उन्हें आर्थिक संकट में धकेलने वाली थी और हुआ भी वही। 

जबकि, ऐतिहासिक शक्ति के साथ सत्ता में बैठी रघुवर सरकार चाहती तो सहायक पुलिसकर्मी की नियुक्ति परमानेंट तौर पर कर सकती थी। लेकिन, ऐसा नहीं करना उनकी मासिकता दर्शाती है। जो राज्य में फूट डालो राज करो पर आधारित है। निस्संदेह रघुवर सत्ता के गलत नीतियों ने सहायक पुलिसकर्मियों को गहरी खाई के समक्ष ला खड़ा किया है। अगर राज्य में दोबारा भाजपा की तानाशाह सत्ता आती, तो शायद ये भूखे मरने की स्थिति में होते। 

बहरहाल, हेमंत सरकार ने सूझ-बूझ का परिचय देते हुए इनके मांगों पर विचार करने का दायित्व अनुबंधकर्मी कमिटी को सौंपा है। उम्मीद है कि यह कमेटी तमाम अनुबंध कर्मियों से मिलकर उनके समस्याओं को समझेगी और सरकार को सुझाव देगी कि कैसे राज्य के इन पुलिसकर्मियों समेत सभी अनुबंधकर्मियों के समस्याओं का हल निकाला जा सकता है।

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