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प्रधानमंत्री का यकायक सोशल मीडिया से संन्यास क्यों

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प्रधानमंत्री का सोशल मीडिया से संन्यास क्यों लेना चाहते हैं  

सोशल मीडिया से गुजरात से दिल्ली तक का राजनीतिक सफ़र तेजी से तय करने वाले प्रधानमंत्री यदि यकायक कहें कि वह इसे अलविदा कहने वाले हैं तो स्वतः मन में संदेह जन्म ले लेता है। कहीं 8 नवंबर की तर्ज पर कोई फैसला तो नहीं लेने की तैयारी है। क्या वन नेशन वन पेंशन के तर्ज पर वन सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के शिलान्यास का एलान तो नहीं होने जा रहा है। क्योंकि इन दिनों सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर केन्द्रीय सत्ता की व्यापक तौर पर किरकिरी हो रही है। कहीं अभिव्यक्ति के अधिकार पर ज़ोरदार प्रहार तो करने कि तैयारी नहीं है? ज्ञात हो कि सोशल मीडिया पर नियंत्रण को लेकर काफ़ी सवाल उठते रहे हैं। क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री किसी भी चीज़ से दूरी बना सकते हैं लेकिन प्रचार तंत्र से नहीं।  

दूसरा दृष्टिकोण – देश कि जनता बाँटने के लिए देश पर थोपे जा रहे सीएए-एनआरसी के विनाशकारी प्रयोग के विरुद्ध चल रहे देशव्यापी आन्दोलन सत्ता के हथकंडो के बावजूद जोरों पर है। और देश भर में विस्तार भी हो रहा है। दिल्ली का शाहीन बाग़ इस आन्दोलन का एक प्रतीक केंद्र बन गया है जिसके धरने का मॉडल देश भर में अपनाया जा रहा है। केन्द्रीय सत्ता, उसके तमाम अनुशांगिक दल व गोदी मीडिया जैसे प्रचार तंत्र के बावजूद थमता नहीं देख मोदी जी का यह एलान इससे ध्यान भटकाने या फिर हो रहे विरोध कि आवाज को सुदूर जनता तक ना पहुँचने देने की कोई साज़िश तो नहीं। या फिर अर्थव्यवस्था, बेरोज़गारी, महँगाई जेसे सवालों से अपने फोलोवर्स से पीछा छुड़ाने का प्रयास भर है, क्योंकि ये सबसे अधिक फ़ॉलो किये जाने वाले नेता हैं।

मसलन, इसका खुलासा तो रविवार को होगा कि आगे क्या होने वाला है। यदि कोई दूसरा विकल्प नहीं होता तो भाजपा के आईटी सेल लोगों को रविवार तक इंतजार करने को नहीं कहते। मोदी जी इस कदम से सबसे पहले बेरोज़गारी की तलवार तो इन्हें आईटी सेल कर्मचारियों पर लटकती। और ये विरोध कि मुद्रा में रोड पर नजर आते। शायद प्रधानमंत्री के फैसले से यही संदेश बाहर आता है कि साहेब अपना ही कोई सोशल मीडिया या कोई समानांतर प्लेटफॉर्म लांच कर सकते हैं।

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