मोहन भागवत

मोहन भागवत के हिंदुत्व राग के मायने

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मोहन भागवत के हिंदुत्व राग क्यों अलाप रहे हैं  

1992 में विश्व हिन्दू परिषद का दिया नारा, “गर्व से कहो हम हिन्दू हैं” आज के राजनीति में राजनीतिक सुसाइड का नारा हो गया है। संघ के भीतर बाहर कितना कुछ बदल चुका है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 9 जून 1940 को हेडगेवार अपने आखिरी भाषण में कहे,—–“प्रतिज्ञा कर लो कि जब तक जीवित है, संघ कार्य को अपने जीवन का प्रधान कार्य मानेंगे, हमारे जीवन में यह कहने का दुर्भाग्यशाली क्षण कभी ना आये कि मैं भी संघ का स्वयंसेवक था …।

लेकिन आज के चमकते-दमकते चेहरे तो जानते तक नहीं कि आरएसएस है क्या। और जो ताल ठोंक कर कहते है कि संघ का कार्य जीवन का प्रधान कार्य है उनकी कोई राजनीतिक हैसियत पार्टी लीडर ही नहीं मानते। अब इस जमघट को संगठन में बांधना ही संघ की जरुरत है। इसलिए मोहन मधुकर भागवत राष्ट्रीय स्वयंसेवक के सरसंघचालक को राँची में कहना पड़ता है कि भारत की तरक्की हिंदुओं की जवाबदेही पर निर्भर करती है। हिंदुओं को संगठित करने के अलावा संघ का दूसरा काम नहीं। और हिंदुत्व के भाव से ही समतामूलक व शोषणरहित समाज की स्थापना हो सकती है। 

यह कोई पहली बार नहीं है जब उन्होंने ऐसा कहा – आतंक और हिंदुत्व को लेकर संघ की परिभाषा सामने रखते हुए मोहन भागवत ने साल 2010 में कहा था, “संघ किसी भी तरह की हिंसा और घृणा के विरुद्ध है। संघ का उद्देश्य प्रेम, शांति और संगठन के जरीये हिन्दू समाज की सनातन शक्ति को जागृत करना है।” लेकिन केरल के वामपंथियों से हिंसक तरीके से दो-दो हाथ करने वाले स्वयंसेवकों पर जब सवाल उठे तो  भागवत ने मीडिया पर ठीकरा फोड़ते हुये कह दिए थे कि यह संघ को बदनाम करने के लिये दुष्प्रचार किया जा रहा है।

सरसंघचालक मोहन भागवत ने पहली बार हिंदुत्व का राग नहीं अलाप है

वर्तमान में संघ के क्रियकलापों ने समाज के भीतर पहली बार यह सवाल खड़ा किया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका क्या और किस रुप में है। इस कशमकश को लेकर निचले पाए के स्वयंसेवकों में भी अब बैचैनी है जो स्वयंसेवकों को खुद को मथने पर विवश कर रहा है।  जिसका असर देश भर में चल रहे संघ के डेढ लाख से ज्यादा सेवा प्रकल्पों में भी तेजी से उभरा है कि आखिर उनका रास्ता जा किधर रहा है, जो संघ के वरिष्ठों को परेशान कर रहा है।

पहले स्वयंसेवकों के सवालों का जबाब राजनीतिक सत्ता अक्सर देती थी। जिससे सरसंघचालक को स्वयंसेवकों की दिशा तय करने में परेशानी नहीं होती थी। लेकिन पहली बार संघ के मुखिया के सामने भी यही सवाल है कि राजनीतिक सत्ता के इक्नामिक ट्रासंफोरमेशन के अक्स तले हिन्दू समाज में सनातन शक्ति जागृत करने का कौन सा तरीका कारगर हो सकता है, जिससे स्वयंसेवकों के सामने एक लक्ष्य तो नजर आये। क्योंकि सच तो यह है कि आर्थिक बदलाव ने न केवल हिन्दू समाज को बल्कि स्वयंसेवकों को भी प्रभावित किया है।

मसलन, संघ का रास्ता समाज के शुद्दीकरण के उस चौराहे पर जा खड़ा हुआ है, जहां उसका अपना नज़रिया चौराहे पर की बे-लगाम आवाजाही को लाल-हरी-पीली बत्ती के आसरे नियंत्रण में लाने का भ्रम बनाये रखना चाहती है। और यह भ्रम है अगर इसको लेकर स्वयंसेवकों में सवाल खड़े हो जाये तो रास्ता किधर जायेगा, इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है।

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