गाँधी

गाँधी तब भी मारे गए, अब भी मारे जाने वाले हैं

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on telegram
Share on whatsapp

चेहरा जब चरखा चला अपना कद बापू बराबर मापने लगे तो उसे सत्य, अहिंसा व देश के गाँठ  के पर्याय के तौर पर भी साबित करना होगा। क्योंकि चरखा तो देश को खुद के इन्फ्रास्ट्रक्चर के पहचान तले गढ़ने का परिचायक है। वैचारिक मतभेदों के बाद भी इससे इनकार नहीं कि गांधी देश हैं। एक ऐसे साहित्य हैं जो हमारे देश के रगों में बहने वाली राष्ट्रीयता का व्याख्या कर लोकतंत्र के मायने गढ़ती है। लेकिन नए चरखा चालक तो गाँधी के चश्मे को उलट देश की नयी परिभाषा गढ़ने को आमादा है। गाँधी ने जिन लकड़ियों को बाँध कर देश गढ़ा, उस बंधन को खोल कौन सी नयी परिभाषा गढ़ी जा सकती है, जहाँ देश ही ख़त्म होने के कगार पर आ खड़ा हो। 

जिस तरह अब के युवा को वैचारिक आतंक से जोड़ते हुये देश में आग फैलाने का प्रयास हो रहे हैं, गाँधी के मौत के घाट उतारने वाली विचार से आगे के हालात हैं। जिससे देश के अंदरुनी हालात इतने तनावपूर्ण हो चले हैं कि हर छोटी सी चिंगारी भयानक आग की आशंका पैदा कर रही है। चिंता इसलिए करनी चाहिए क्योंकि आज के युवा आधुनिक तकनीक के दौर की पीढी है। पढ़ी लिखी मगर बेरोज़गार, रोज़गार की मांग करने वाली पीढी है। जिनके सरोकारों के मतलब ही देश है। जाहिर है ऐसे में उस विचारधारा ने खुद के लिए तब भी देश, गाँधी की हत्या की थी, आज भी युवाओं के सरोकारों वाले संस्थानों को बेच, देश की ही हत्या कर रहे हैं।

मसलन, जिस देश की संस्कृति के मायने ही अनेकता में एकता हो, उसे आज़ादी के 72 बरस बाद एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया जाए, जहां गांधी बेमानी लगे। या कहें कि सत्ता ने जिस गाँधी के प्रतीकों के आसरे राजनीति की बिसात पर गाँधी को ही मोहरा बना दिया -जिसमे मात गांधी के विचारों का होना तय हो। जहाँ उनके विचारों को आतंक मानकर देश को जलाने की तैयारी हो। वहां बापू के 72वें पुण्यतिथि पर सबके ज़हन में एक ही सवाल होना प्रासंगिक हो जाता है कि देश का होगा क्या?

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on telegram
Share on whatsapp

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Related Posts