सोहराय बंधनमुक्त व स्वाधीनता के परिचायक 

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सोहराय

पशु- प्रकृति समेत तमाम जीवों को बंधनमुक्त कर स्वाधीन रूप में विचरण करने की परंपरा अर्थात प्रेम और परोपकार का पर्याय है सोहराय पर्व। सोहराय शब्द की उत्पत्ति सोहारओ या सोहार से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ आदर सम्मान के साथ संवर्धन कराना है। यह पर्व संथाल संस्कृति का सर्वाधिक लोकप्रिय समाजिक उत्सव है। वैसे तो यह पर्व झारखंड राज्य के क्षेत्रों में कार्तिक माह के अमावस्या से लगातार पाँच दिनों तक मनाया जाता है, लेकिन उत्तरी छोटा नागपुर व पुराना संथाल इस पर्व को जनवरी 8 से 13 तक मनाते हैं।

1855 के संथाल विद्रोह के कारण इस पर्व के प्रति लोगों की सक्रियता को प्रभावित कर दिया। क्योंकि उस दौरान कृषि कार्य में भी कमी आई थी। इसलिए यह पर्व संक्रांति के साथ मनाने की प्रथा प्रचलित हुई। यह पर्व अमीर ग़रीब के भेद मिटाने के लिये भी जाना जाता है। इस पर्व में लोग अपने घरों को रंगाई पुताई करते है, पर्यावरण दूषित होने के भय से ये अपने घरों की रंगाई बिना किसी रासायनिक मिश्रित रंगों के करते हैं।

इस पर्व के अवसर पर विशेष रूप से विवाहित बहन-बेटियों को निमंत्रण देकर बुलाया जाना अनिवार्य है। साथ ही इष्ट मित्र व सज्जनों को भी बुलाया जाता है। निमंत्रण पा कर बहन-बेटियाँ अपने माता -पिता, भाई-बहन व अन्य सगे संबंधी-पड़ोसियों से मिलने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी आते हैं। प्रवासी स्त्रियों के लिए अपने सगे-सम्बन्धियों से मिलाने का यह एक मात्र अवसर होता है। यह पल मिलने और बिछड़ने के एहसास की स्वीकार्यता का गवाह बनते है।

मसलन, झारखंडियों का यह सोहराय पर्व हमें सुख व दुःख दोनों ही स्थितियों में एक सामान जीवन व्यतीत करने का सीख देती है। संथाली सुख व दुःख दोनों ही स्थितियों में एक साथ नाचते गाते हैं। सुखी जीवन का यही तो वास्तविक सार हैं। आज महत्वपूर्ण यह है कि इस पर्व का अर्थ झारखंड प्रदेश में साकार हो और आदर-सम्मान के साथ इस पर्व को इसके अर्थ के साथ पहचान मिले। 

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