फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना एक निर्णायक कदम

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फास्ट ट्रेक

पिछले पाँच वर्षों के शासनकाल ने झारखंडी समाज के स्त्रियों और गरीब बेटियों की स्थिति को उघाड़ कर पेश किया है। फ़ासीवादी नेताओं व पुलिस-प्रशासन की सरपरस्ती के नीचे पलने वाले अपराधी बेखौफ़ होकर इन्हें निशाना बनाते रहे हैं। सरकार न्याय देगी यह उम्मीद ही बेमानी हो चुकी थी। राज्य के तमाम वर्गों की जनता ने एकजुटता  दिखाई और तख़्त ही पलट दिया। सूबे में नयी सरकार ने शपथ ली और आते अपनी माँ, बहन व बेटियों की ख़बर पहली ही कैबिनेट में ली। बलात्कार और पोसको एक्ट के लंबित तमाम मामलों पर त्वरित सुनवाई के लिए राज्य में 22 फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय की स्थापना का आदेश दिया। 

झारखंड के नए मुख्यमंत्री ने इसी के साथ साफ़ कर दिया कि वह धर्म, जाति, क्षेत्र से ऊपर उठकर ग़रीब आम लोगों के साथ खड़ी है। जो राज्य के लिए एक बड़ी बात व शुभ संकेत हो सकते हैं। क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से यह देखा जा रहा है कि धार्मिक कट्टरपंथी, चुनावी दलाल नेता, पुलिस-प्रशासन के पिट्ठू व छुट्टभैया नेता ऐसे मामले को एक ‘‘कौम’’ का मसला बनाने का प्रयास करती है। राज्य के मुखिया ने महिलाओं के इस संघर्ष को नया आयाम दे उनका मान बढ़ाया है। 

मसलन, फास्ट ट्रेक कोर्ट की स्थापना का ऐलान उन स्त्रियों के लिए जिन्हें समाज में जुल्मों का शिकार बनाया जा रहा है, राहत भरी ख़बर है। क्योंकि ऐसे मामले केवल किसी एक परिवार के नहीं बल्कि सभी उत्पीड़ित स्त्रियों, आम जनता, नौजवानों, छात्रों, इंसाफपसंद लोगों के मसले हैं। स्त्रियों के साथ छेड़छाड़, अपहरण, बलात्कार, तेजाब फेंकने, मारपीट, आदि की घिनौनी घटनाएँ बढ़ती ही जा रही हैं। दिनदिहाड़े लड़कियों को अगवा किया जा रहा है, बलात्कार का शिकार बनाया जा रहा है। हेमंत सरकार के इस फैसले से इन महिलाओं की सुरक्षा की उम्मीद बढ़ गई है। फास्ट ट्रैक कोर्ट जिस हद तक भी हमें कुछ प्राप्त हो सकता है वह सराहनीय है।

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