नोटबंदी के तीन वर्ष बाद भी कालाधन का पता नहीं

नोटबंदी के तीन वर्ष उपरान्त शहीद नागरिकों को कैसे याद करें

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2008 में लिंचिस्टाइन पेपर, 2010 में विकि लीक्स, 2011 में एचएसबीसी पेपर, 2013 में आफसोर लीक्स,  2014 में लक्जमबर्ग लीक्स, 2015 में स्विस लीक्स, 2016 में पनामा पेपर और बहमास लीक्स से लेकर नोटबंदी के तीन वर्ष, 2019 के बाद तक किसी का नाम सामने आया नहीं कि कौन सा नेता व रईस कमीशन व टैक्स चोरी कर दुनिया में कहां-कहां कितना पैसा छुपाया हैं। कार्रवाई या जांच तो दूर की कोडी है। अरुण जेटली कहते रहे कि बाक़ायदा 450 लोगो को नोटिस दिया गया जिसकी जांच सीबीडीटी कर रही है। यानी  इनक्म टैक्स विभाग अब तक तय ही कर रहा है लीक्स में आये नामो के खिलाफ कौन सी जांच हो।

रिपोर्टें खुलासा करती है कि राजनेता, सेलिब्रिटी, कारपोरेट्स और तमाम जमा संपत्ति का 80 फ़ीसदी जिनके पास है वह केवल 0.1 प्रतिशत हैं। साथ ही इस 0.1 प्रतिशत का एक फीसदी अमीरों के पास इस 80 फ़ीसदी का 50 फ़ीसदी धन है। तो ऐसे में जिन लोगों के नाम काले धन की सूची में होंगे, जाहिर है उन रईसों की दुनिया सत्ताधारियों के इर्द-गिर्द होगी है। यकीनन कोई नहीं जानता क्योंकि सारा कच्चा चिट्टा तो सरकार के ही पास है। जबकि बीजेपी इस अंदाज़ में यूपीए पर हमला करती थी कि सत्ता में आते ही वह सारे नाम सार्वजनिक कर देगी। ऐसे में काला धन का सच क्या हो सकता है…

नागरिक नोटबंदी के तीन वर्ष को कैसे याद करे

मसलन, आज तीन बरस बाद भी नोटबंदी से कितना कालाधन वापस आया-कोई नहीं बता पाया। उल्टा कालाधन धारकों ने कालाधन सफेद कर लिया-इसकी आशंका बरकरार है। तो क्या माना जाए कि नोटबंदी से उत्पन्न त्रासदी मंदी जिसने करोड़ों की नौकरीयां निगल ली, बैंको की हालत खस्ता कर दी, उस त्रासदी पर पर्दा डालने का प्रयास भर है राम मंदिर फैसले की सुगबुगाहट। ऐसे में नोटबंदी के तीन वर्ष उपरान्त क्या याद किया जाए नोटबंदी दिवस या फिर 100 से ऊपर नागरिक शहीद दिवस।

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