आरसीईपी समझौता

आरसीईपी नोटबंदी व जेएसटी के बाद तीसरा बड़ा झटका हो सकता है 

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आरसीईपी (रीजनल कंप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप) को नोटबंदी व जेएसटी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था पर तीसरा बड़ा झटका माना जा रहा है। कई किसान संगठनों ने इसका अभी से ही विरोध करना शुरू कर दिया है। इन संगठनों का कहना है कि यह व्यापार समझौता कृषि पर आधारित लोगों की आजीविका, बीजों पर उनके अधिकार के लिए खतरा बन सकता है। खासकर, इस समझौते का बुरा असर सबसे अधिक डेयरी सेक्टर पर पड़ेगा।

आरसीईपी कुछ देशों का एक समूह है, जिसमें ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, म्यामांर, फिलिपीन, सिंगापुर, थाइलैंड, वियतनाम, आस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड शामिल हैं। इनके बीच में एक मुक्त व्यापार समझौता होने जा रहा है। जिसके बाद इन देशों के बीच बिना आयात शुल्क दिए ही व्यापार किया जाना संभव होगा।

किसान यूनियन का कहना है कि यह विश्व व्यापार संगठन से ज्यादा खतरनाक है। आसियान ब्लॉक देशों को सस्ते आयात की मंजूरी देकर भारत पहले ही 2018-19 में अपना 26 हजार करोड़ रुपए का नुकसान कर चुका है। यदि यह समझौता पूरी तरह लागू हो जाता है तो आरसीईपी 92 प्रतिशत व्यापारिक वस्तुओं पर शुल्क हटाने के लिए भारत को बाध्य करेगा, लेकिन प्रावधान के अनुसार भारत बाद में ड्यूटी बढ़ा नहीं सकेगा। जिससे भारत को अपने किसानों और उनकी आजीविका के संरक्षण में खासी दिक्कत होगी, ऐसे में  देश को 60 हजार करोड़ के राजस्व का नुक़सान होगा। 

भारत के अधिकांश असंगठित डेयरी सेक्टर वर्तमान में 15 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करता है। आरसीईपी समझौता लागू होने से न्यूजीलैंड आसानी से भारत में डेयरी उत्पाद सप्लाई करेगा, जोकि उसका केवल 5 प्रतिशत डेयरी उत्पाद भारतीय बाजार का एक तिहाई के बराबर होगा। कल्पना करें कि अन्य देश भी जब अपना डेयरी उत्पाद यहां झोकेंगे तो क्या परिणाम होगा। डेयरी के अलावा, आरसीईपी विदेशी कंपनियों को महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे बीज और पेटेंट में भी छूट देगा जिससे जापान और दक्षिण कोरिया से आने वाले बीजों, दवाइयों, और कृषि रसायनों का प्रभुत्व यहाँ बढ़ जाएगा।

मसलन, जनसंख्या के आधार पर आरसीईपी अब तक का सबसे बड़ा विदेशी व्यापार समझौता होगा, जोकि दुनिया की 49 फीसदी आबादी तक पहुँचेगा और विश्व व्यापार का 40 फीसदी इसमें शामिल होगा, जो दुनिया की एक तिहाई जीडीपी के समान होगा। ऐसे मे हम कहाँ टिकेंगे… और  करोड़ लोगों का क्या होगा?

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