स्वायत्त संस्थाएँ जब सत्ता के लिए काम करती हैं तब शुरू होती है लोकतंत्र की लिंचिंग  

स्वायत संस्थाएँ

सत्ता के इशारों पर नाचते स्वायत्त संस्थाएँ 

“लोग कहते हैं आंदोलन, प्रदर्शन और जुलूस निकालने से क्या होता है…? इससे यह सिद्ध होता है कि हम जीवित हैं, अटल हैं और मैदान से हटे नहीं हैं। हमें अपनी हार ना मानने वाले स्वाभिमान का प्रमाण देना था। हमें ये दिखाना है कि गोलियों और अत्याचारों से भयभीत होकर अपने लक्ष्य से हटने वाले नहीं और हम उस व्यवस्था का अंत करके रहेंगे, जिसका आधार स्वार्थीपन और खून पर है।” ~मुंशी प्रे‌मचंद

मुंशी प्रे‌मचंद, जिन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, तीन नाटक, दस अनुवाद, सात बाल पुस्तकें तथा हजारों पृष्ठों के‌ लेख व संपादकीय की रचना की, को नमन। 

कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा ने ध्वनि मत के जरिए विश्वास प्रस्ताव जीत कर विधानसभा में गत सोमवार को अपना बहुमत साबित किया सरकार के पक्ष में 105 वोट पड़े जबकि कांग्रेस के पक्ष में 99 वोट पड़े दरअसल 17 विधायकों को स्पीकर की ओर से अयोग्य घोषित किए जाने से बीजेपी की राह आसान हो गई थी, क्योंकि सदन में बहुमत का आंकड़ा 105 पहुंच गया था

ग़ौरतलब है कि 16 विधायकों का सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद राज्य में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार गिर गई थी इसके बाद येदियुरप्पा की ओर से सरकार बनाने का दावा पेश किया गयाराज्यपाल की मंजूरी के बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और उन्हें एक हफ्ते का समय दिया गया वहीं दूसरी ओर से अयोग्य घोषित किए गए विधायकों का कहना है कि वे स्पीकर के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे

असल में लोकतंत्र का संकट यही है कि राजनीतिक सत्ता ही जब खुद को सबकुछ मानने लगे और संवैधानिक तौर पर स्वायत्त संस्थाएँ भी जब राजनीतिक सत्ता के लिए काम करती हुई दिखायी देने लगे तो फिर लोकतंत्र की लिचिंग इसी प्रकार शुरु हो जाती है। और इसे रोकने वाला कोई नहीं होता। यहाँ तक कि लोकतंत्र की परिभाषा भी बदलने लगती है। 

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