ईंट-भट्ठों में ग़ुलामों की जिन्दगी जीने को मजबूर हैं झारखण्ड-बिहार के मज़दूर

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ईंट-भट्ठों

झारखण्ड-बिहार के लोग हरियाणा के ईंट-भट्ठों में बंधुआ मजदूर

बँधुआ मज़दूरी कहने को तो देश से समाप्त हो चुका है, लेकिन देश के कई हिस्सों में अब भी ईंट-भट्ठों, धनी किसानों के खेत व कारख़ानों में झारखण्ड-बिहार के हज़ारों लोग महज पेट की आग बुझाने के लिए बंधुआ मजदूरी करने को मजबूर हैं। कई जगहों पर तो पूरे परिवार बँधुआ मज़दूर बनाकर रखे गये हैं। जब कुछ मज़दूर किसी प्रकार मालिकों के चंगुल से निकल जाते हैं, तब उनकी भयानक दशा लोगों के सामने आ पाती है। पता चलता है कि उन्हें काम की मज़दूरी नहीं दी जाती, घटिया और बहुत कम खाना मिलता है, मारपीट की जाती है और साथ ही दासों की तरह 12-13 घण्टे काम करवाया जाता है। 

प्रशासन का रवैया अक्सर ऐसे मामलों में निराशाजनक होता है। इन मज़दूरों को ये “मुक्त कराने” की नुमाइश तो करती है, लेकिन अख़बारों में फ़ोटो आदि छप जाने के बाद इनको उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है। कई ऐसे मामले भी सामने आये हैं, जब छुड़ाये गये मज़दूर फिर से बँधुआ बनने को मजबूर हो गये। जबकि बँधुआ मजदूर बनाने वालों के ख़ि‍लाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होती। ऐसे ही एक मामले में झारखण्ड-बिहार राज्य के तकरीबन 70 बँधुआ मज़दूर को हरियाणा के कुरुक्षेत्र में आज़ाद कराये गये। इनमें गर्भवती स्त्रियाँ और 12 साल तक के बच्चे भी हैं, जो लगभग एक साल से वहाँ ईंट-भट्ठे पर काम कर रहे थे। 

एक सामाजिक कार्यकर्ता की कोशिशों से कुरुक्षेत्र के दिवाना गाँव के ईंट-भट्ठों से पिछले 28 जून को इन मज़दूरों को छुड़ाया गया, लेकिन पुलिस ने न तो किसी पर केस दर्ज किया और न किसी की गिरफ़्तारी ही की, जबकि बँधुआ मज़दूरी करवाना एक गम्भीर अपराध है। कुरुक्षेत्र प्रशासन ने उन छूटे मज़दूरों को क़ानून के तहत प्रमाणपत्र भी नहीं दिया। बिना प्रमाणपत्र ये लोग ‘बँधुआ मज़दूर पुनर्वास योजना’ के तहत मुआवज़े का दावा भी नहीं कर सकते और न ही बँधुआ मज़दूरों के लिए बनी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठा सकते हैं। इस योजना के तहत पुरुष मज़दूरों को बकाया मज़दूरी के अलावा एक-एक लाख रुपये और औरतों तथा बच्चों को दो-दो लाख रुपये मुआवज़ा देने के प्रावधान है।

झारखण्ड ऐसा राज्य है जहाँ के लोग बेरोज़गारी व विस्थापन के आभाव में रोज़गार की तलाश में सबसे अधिक प्रवास करते हैं। वह पेट की आग बुझाने के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक की खाक़ छानते हैं। वे खदानों में, कपड़ों की फ़ैक्टरियों में, तटीय इलाक़ों में चाय बागानों आदि में काम करते हैं। वे हर तरीक़े के ख़तरनाक काम भी करते हैं। ठेकेदार इन्हें बहला फुसलाकर ले जाते हैं और कमीशन के लालच में बेच देते हैं । और राज्य की सरकार केवल जुमलेबाजी की आड़ में हाथियों को उड़ाती रह जाती है। 

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