झारखंड के बच्चों के लिए कठीन डगर

बच्चों को पैदल नदी पार कर जाना पड़ता है स्कूल 

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झारखंड चरही के तरिया टोला के बच्चों के लिए विद्यालय तक सात किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए कोई रास्ता नहीं है राँची से हज़ारीबाग़ जाने के रास्ते से बिल्कुल सटे प्रखंड के इस गाँव के बच्चे हर दिन ढेबागढ़ा नदी पार कर स्कूल जाने को मजबूर हैं वो कहते हैं, “सरकार के लोग क्या जानें, नदी के बहाव में सांप भी बहते हैं” भारत सरकार की ओर से जारी डिस्ट्रिकिट इंफार्मेशन सिस्टम फ़ॉर एजुकेशन (डीआइसइ) 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक़, सूबे के 48 फ़ीसद सरकारी स्कूलों तक सभी मौसम में पहुंचने लायक रास्ते नहीं हैं

झारखंड में 41,000 प्राइमरी और मिडिल स्कूल हैं, लगभग 20,000 स्कूलों तक सभी मौसम में चलने लायक रास्ता तक नहीं हैं लिहाज़ा लाखों बच्चे ख़तरों का सामने करते हुए स्कूल पहुंचते हैं इन्ही परेशानियों से दो-चार होना पड़ता है सुदूर इलाक़ों में तैनात शिक्षकों को भी स्कूल के शिक्षक का कहना है कि, “बच्चों के स्कूल आने और छुट्टी के बाद तक हमारी नज़रें नदी पर ही टिकी होती है हम ख़ुद भी ऐसे ही पार कर घर पहुँचते हैं कई दफ़ा ऊपर तक बात पहुँचाई गई, लेकिन रास्ता नहीं निकला.” इस स्कूल मे पढने वाले बच्चों के मां-बाबा यह ज़रूर कहते हैं “डर तो बना रहता है, पर अब आदत हो गई है

बाढ़ आने पर छोटे बच्चे स्कूल जाना छोड़ देते हैं, जबकि नदी के पूर्वी छोर पर स्थित पोडोकोचा के ग्रामीणों को भी उक्त नदी पर पुल नहीं होने से परेशानी का सामना करना पड़ता है यहाँ के ग्रामीण करीब 20 वर्षों से पुल बनवाने की मांग कर रहे हैं। चूँकि तरिया टोला महज 18 घरों और लगभग 100 लोगों का ग्राम है, और इतने कम लोग तो वोट बैंक नहीं हो सकतेशायद इन्हीं वजहों से इनकी मांग को ठुकराना सरकार के लिए जायज़ हैं।इसलिए  जिला परिषद सदस्य अग्नेशिया सांडी पूर्ति के पुल बनाने की अनुशंसा के बाद भी अनसुनी कर दी गयी है ज्यादा और क्या होगा इस बरसात भी बच्चे स्कूल नहीं जा पायेंगे

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