निजी अस्पतालों का हाल

झारखंड के निजी अस्पतालों के मनमानी पर सरकार मौन  

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झारखंड में निजी अस्पतालों का आतंक 

एक तरफ एनआरएस मेडिकल कॉलेज के दो जूनियर डॉक्टरों पर हुए जानलेवा हमले के विरोध में झारखंड के जूनियर डॉक्टरों ने भी ओपीडी ठप कर दी हैराजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (रिम्स) में शुक्रवार को जूनियर डॉक्टरों ने ओपीडी में काम नहीं किया, उनके जगह सीनियर डॉक्टरों ने मरीजों का इलाज कर रहे हैंबोकारो जेनरल हॉस्पिटल की डॉक्टर श्वेता ने कहा है कि वे डॉक्टरों की सुरक्षा के मद्धेनजर आंदोलन करने को मजबूर हैं। लेकिन अबतक झारखंड सरकार ने भी इनकी सुध नहीं ली है।

वहीँ दूसरी और रिम्स में आयुष्मान योजना के अंतर्गत दवा के आभाव में हो रही मौतों के बीच निजी संस्थान के अस्पताल की भी ख़बर आयी है, जो भयावह हैबुधवार की सुबह जगन्नाथपुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत शिव मंदिर के पास बाइक की चपेट में आने से छह वर्षीय छात्र मोहित कुमार घायल हो गया था बेहतर इलाज के लिए उसे रांची के ही रानी चिल्ड्रेन अस्पताल में भर्ती करवाया गया, लेकिन वहां उसकी मौत हो गयी बच्चे की मौत की जानकारी मिलने के बाद परिजनों का अस्पताल प्रबंधन पर आरोप लगाया कि बच्चे की मौत के बाद भी पैसे एंठने के लिए उसे जानबूझ कर वेंटिलेटर पर रखा गया साथ ही मृत्यु प्रमाण पत्र भी देने में देरी की गयी

मृतक के दादा कृष्णा राय के अनुसार बच्चे को मृत घोषित कर दिए जाने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने शव और मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए बार-बार टाल-मटोल किया जब मामला बर्दाश्त से बाहर हो गया, तब हंगामा किया गया बहरहाल, वैसे भी झारखंड के तमाम निजी अस्पताल और नर्सिंग होम केवल लोगों को लूटने के लिए हैं। चूँकि निजी सेवाओं के नियमन की यहाँ कोई व्यवस्था नहीं होने से हर तरफ मनमानी का वातावरण है। सरकारी उदासीनता के कारण निजी अस्पतालों के घटिया होने के बावजूद लोग वहां जाने के लिए मजबूर हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं तक की पहुँच आम जनता के लिए मुश्किल और महँगी होती जा रही है। ऊपर से सरकारी अस्पतालों में भारी भीड़, दवाओं के ना मिलने के बीच स्वास्थ्य की समस्या मौजूदा सरकार में और भी गंभीर हो गयी है।  

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