एससी-एसटी-ओबीसी के आरक्षण अब मेडिकल क्षेत्र में भी स्वाहा

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एससी-एसटी-ओबीसी के आरक्षण स्वाहा

देश में भाजपा अपने कार्यकाल में धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा आदि के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ खूब सेकी हैं और लगातार फासीवादी माहौल को खाद-पानी भी देती रही है। साथ ही एससी-एसटी-ओबीसी के मिले आरक्षण पर भी प्रहार करने से नहीं चुकी, सामने से सफल न होने की स्थिति में पिछले दरवाजे से भी प्रयास करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा।

प्रतीत होता है कि भाजपा ने अपने घोषणापत्र में एससी-एसटी-ओबीसी के आर्थिक और सामाजिक बराबरी के लिए मौक़े, रोज़गार, सामाजिक एकता और न्याय की गारंटी, अछूत जैसी पिछड़ी मूल्य-मान्यताओं का ख़ात्मा करने, शांतिपूर्ण और सुरक्षा का माहौल उपलब्ध करवाने जैसे एजेंडे को लिख कर बेवजह ही काग़जें काली की, क्योंकि मोदी जी ने अपने पूरे कार्यकाल में इन मामलों पर कभी सोचा-विचारा तक नहीं।

उपरोक्त कथन को सत्य करती उदाहरण – स्वायत्त संस्था मेडिकल कौंसिल आफ इंडिया (एमसीआइ) निजी मेडिकल कॉलेजों में एससी, एसटी और पिछड़े छात्रों को मिल रहे आरक्षण को खत्म करने पर अड़ा हुआ है। यहां तक कि एमसीआइ ने स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से मेडिकल कालेजों में नामांकन के लिए सरकार की ओर प्रस्तावित सुधारों को अधिसूचित करने से भी इनकार कर दिया है।

सूत्रों की मानें तो इस कहानी का शुरुआत स्वास्थ्य मंत्रालय से होता है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश में मेडिकल शिक्षा को सुचारू बनाने के नाम पर कई संशोधनों को प्रस्तावित किया। लेकिन एमसीआइ ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए उन प्रस्तावित सुधारों के साथ निजी मेडिकल कॉलेजों में राज्य सरकारों के लिए निर्धारित 50 फीसदी कोटे, जिससे  एससी, एसटी और पिछड़ी जाति के छात्रों को आरक्षण दिया जाता था, को भी समाप्त करने की शर्त जोड़ दी। इन स्थितियों में राज्यों के 50 फीसदी सीटें खत्म होने के बाद एससी-एसटी-ओबीसी वर्ग के छात्र आरक्षण के लाभ से अब वंचित हो जाएंगे।

स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी की मानें तो इस मामले को लेकर एमसीआइ के साथ विभाग की कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। वे कहते है कि एमसीआइ इस मुद्दे को टालने का प्रयास किया, जब बात नहीं बनी तो एमसीआइ ने अदालत के फैसले का हवाला देते हुए राज्यों के 50 फीसदी कोटे को खत्म करने की मांग की। लेकिन जब अदालती आदेश की जांच हुई तो पता चला कि वह आदेश केवल एक-दो कॉलेजों से ही संबंधित है। और एमसीआइ इसके आड़ में सभी कॉलेजों का कोटा समाप्त करने पर तुली है  

बहरहाल, एमसीआइ ने सीनाजोरी करते हुए साफ़ कर दिया है कि निजी कालेजों में राज्यों के 50 फीसदी कोटे के प्रावधान समाप्त किये बिना वह मेडिकल शिक्षा में अन्य संशोधनों को अधिसूचित नहीं करेगा। ऐसे में राज्यों के एससी-एसटी-ओबीसी वर्ग के छात्र जो पहले से 13 रोस्टर को लेकर परेशान हैं, उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा कि यह सरकार की कैसी सुधार नीति है जो उनके भविष्य को ही अँधेरे में धकेल धकेल रही है!

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