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आदिवासी भाजपा के नजरों में जमींदार और कॉर्पोरेट जगत नवगरीब एवं भूमिहीन

आदिवासी भाजपा के नजरों में जमींदार और कॉर्पोरेट जगत नवगरीब

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रघुवर सरकार आदिवासी को जमींदार और कॉर्पोरेट जगत को गरीब एवं भूमिहीन मानती है 

देश में नयी आर्थिक नीतियों के लागू होते ही कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का अर्थ किस प्रकार परिवर्तित हुआ इसका जीवंत मिसाल झारखंड के रूप में देखा जा सकता है। यहाँ के लोक शब्दों में बयाँ करें तो मौजूदा सरकार यहाँ के आदिवासियों को जमींदार और टाटा-मित्तल जैसे पूंजीपतियों को सबसे गरीब और भूमिहीन समझने लगी है। शायद यही वे कारण हैं जिसकी वजह से आदिवासियों से जमीन का मालिकाना हक छीन इन नवगरीबों को कौड़ी के भाव लूटाना इस सरकार की लोकतांत्रिक जिम्मेदारी बन गयी है।

आज यह सरकार नीलाम्बर-पीताम्बर जैसे आदिवासी अस्मिता के प्रतीकों का इस्तेमाल अपने कॉर्पोरेट हितों के प्रतिपादन हेतु रणनीतिक तौर लगातर कर रही हैं। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य एक ओर तो बाहरी दुनिया  में खुद को आदिवासी हितों का संरक्षक घोषित करना होता है तो वहीं दूसरी तरफ आंतरिक तौर पर आदिवासियों के बीच ऐसे बिचौलिये नेताओं की खेप पैदा करना है जो अस्मिता के नाम पर आदिवासियों के  वोट तो बटोर लें पर उनके बीच इन लोकनायकों के राजनीतिक दर्शन को कोई ठोस आकार न लेने दें। ठीक वैसे ही जैसे गांधी और लोहिया के नाम पर अबतक होता आया है।

उदाहरणार्थ, झारखंड में बिरसा मुंडा की प्रतिमा तो खूब देखी जा सकती हैं, जिनके व्यक्तिव के छाँव में वोट कि उपज होती है लेकिन उस चेतना की राजनीतिक आभिव्यक्ति भाजपा के राजनीति में दूर-दूर तक नहीं दिखती। गढवा, पलामू और लातेहार जैसे माओवादी बाहुल्य क्षेत्रों में भी नीलाम्बर-पीताम्बर की आदमकद मूर्तियों के माल्यापर्ण का एक भी मौका यह सरकार नहीं चूकती। वहीँ कोई सत्ता-आलोचक नीलाम्बर-पीताम्बर की राजनीतिक जीवनी लिखने की हिमाकत करता है तो उसकी शामत आना तय है।

झारखण्डी आदिवासी समाज अपने इतिहास और उसके बोध से उत्पन्न हुए मूल्यों (जल-जंगल- जमीन) की रक्षा की लडाई लड रहा है। इनके लिए बडा सवाल तो 1908 में बने सीएनटी ऐक्ट की रक्षा का है। जो इन्हें अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ लम्बे संघर्ष के बाद प्राप्त हुआ था। लेकिन आज विकास के नाम पर कॉर्पोरेट परस्त सरकार इस कानून को ध्वस्त करने पर उतारू हैं। ऐसे में यदि बिरसा मुंडा, नीलाम्बर-पीताम्बर और तिलका मांझी के विद्रोहगाथा को गाने-गुनगुनाने वाला आदिवासी-मूलवासी समाज अपने इतिहास की तरफ मुडता है तो क्या इसे विद्रोह कहा जाएगा या अपने संवैधानिक आदर्शों से भटक गए राष्ट्र को एक बार फिर पटरी पर लाने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी का निर्वहन?

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