साथ लोकसभा-विधानसभा चुनाव भी नहीं बचा पायेगा रघुबर दास को

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लोकसभा चुनाव के साथ झारखंड विधानसभा चुनाव करना चाहती है भाजपा 

कडक चाय का मायना ही देश में अब बदल चुका है। साथ ही झटके में लगने लगा है कि जेटली-गडकरी समेत अन्य मुख्य भाजपा के नेता पार्टी में अपनी जगह ऊपर करने में जोर-शोर से जा जुटे है। तो अब साफ़ है कि देश में मोदी-जादू-सुनामी खत्म! सुब्रमण्यम स्वामी जेटली को ही सबसे बडा अपराधी बता रहे हैं तो योगी कह रहे है कि मोदी तो कभी राम मंदिर बनाना ही नहीं चाहते। गडकरी इशारा करते है, कारपोरेट उनके पीछे खडा हो जाये तो वे मोदी रहित बीजेपी को सत्ता में एक बार फिर ला सकते है। संघ भी चिंतन कर रहा है कि जब जहाज डूबेगा तो उनकी साख कैसे बचेगी।

इन हालातों के बीच झारखण्ड के रघुबर साहेब की स्थिति सबसे अधिक दयनीय है। क्योंकि झारखण्ड में कोई भी ऐसा वर्ग शेष नहीं बचा है जो रघुबर सरकार से खुश हो। इसलिए ये बखूबी समझ रहे हैं कि अकेले खुद के बलबूते झारखंड में चुनाव नहीं जीता जा सकता। साथ में लगभग यही हाल भाजपा का महाराष्ट्र और हरियाणा में भी है।

बहरहाल, भाजपा झारखण्ड का पूरा खेमा रघुबर सरकार की दुर्दशा से परेशान है और उन्हें इस भंवर से निकलने की कोई युक्ति नहीं सूझ रही। पार्टी चिंतित है कि अब जुमलों और झूठे वादों से नैया पार नहीं हो सकती है। साथ ही मुख्यमंत्री रघुबर दास ने विगत 4 वर्षों में भाजपा के विधायकों और सांसदों की जिस प्रकार अनदेखी की है वह भी उसे डरा रही है। और इन्हें झारखण्ड विधानसभा चुनाव में अपनी हार साफ़ दिख रही है। मसलन, इस हार को टालने के लिए प्रदेश भाजपा ने राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र लिखकर याचना की है कि झारखंड विधानसभा चुनाव को भी लोकसभा चुनाव के साथ करा दिया जाय। मोदी-शाह के खेमे के माने जाने वाले रघुबर दास महागठबंधन के अति वेग से मोदी नाम के सहारे बचना चाह रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है की झारखण्ड में जो हाल रघुबर दास का है ठीक वही हाल मोदी जी का देश भर में है। स्थिति यह है कि इस बार हमाम में पूरी संघ-भाजपा नंगी है।

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