झारखंड की 13 ( तेरह ) नदियों में 6 ( छह ) नदियां मरने के कगार पर खड़ी

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झारखंड की नदियों का हाल

झारखंड के आदिवासियों का जीवन ही नदियों से है 

इस समय केरल की लगभग साढ़े तीन करोड़ आवाम ने 70 वर्षों की सबसे विनाशकारी तबाही झेली है। लाखों लोग बेघर और आजीविका के साधन से महरूम हो राहत शिविरों में शरण लेने को मजबूर हुए। केरल को इससे उबरने में लम्बा समय लगेगा। इस विनाशलीला की मार सबसे अधिक ग़रीब आवाम को ही झेलनी पड़ी है। इसी समय सोशल मीडिया पर घिनौने अभियान चला केरल में मदद न भेजने की अपील भी की गयी। लिखा गया कि वहाँ आधे से ज़्यादा मुस्लिम और ईसाई रहते हैं, तो किसी ने लिखा कि सबरीमाला देवस्थान में स्त्रियों के प्रवेश हेतु चलाए गए आन्दोलन का परिणाम है।

इनके पीछे कौन लोग हैं हर कोई समझता है। सरकार के प्रचार पर 4300 करोड़ ख़र्च करने और मूर्तियों पर हज़ारों करोड़ ख़र्च करने वाली केन्द्र सरकार ने रहत के नाम पर पहले तो केरल को सिर्फ़ 100 करोड़ की सहायता, चौतरफ़ा आलोचना हुई तो 500 करोड़ की सहायता की घोषणा की। लेकिन इतने व्यापक स्तर की तबाही देखते हुए यह राशि भी बेहद मामूली है।

इन परिस्थितियों के बीच एक आरटीई में पता चला है कि मौजूदा सरकार के दौर में  देश की लगभग 62 फीसदी नदियां वेंटिलेटर पर है। इनकी पानी में ओक्सिज़न की मात्रा लगातार कम हो रही है। सफाई के नाम पर मिले फण्ड का भी इस्तेमाल नहीं हो रहा हैं। जबकि झारखंड का स्थिति तो बिहार से भी बदतर है, यहाँ तो 13 नदियों में 6 नदियां मरने के कगार पर खड़ी है। गिरिडीह के उसरी नदी संरक्षण के तहत नागरिक विकास मंच सरकार की उदासीन रवैये के कारण आंदोलन को मजबूर हैं। इस नदी में नाले के गंदे पानी का विसर्जन लगातार होने के कारण जहाँ जलस्तर घटता जा रहा है वहीं तालाब व कुवां का पानी भी सूखता जा रहा है।

बहरहाल, सरकार कि और से लगातार प्रचार किया जाता है और अज्ञानतावश अधिकांश लोग मान भी लेते हैं कि नदियों का मरना प्रकृति क़हर है, सरकार बेचारी क्या करे? लेकिन कारणों पर निगाह डालने पर पता चलता है कि यह सरकार एवं पूँजीवादियों के गठजोर के तहत मुनाफ़े की अन्धी हवस के परिणामों में से एक है। जबकि सजा वे भुगतते हैं जिनकी कोई ग़लती नहीं होती। झारखंड के परिपेक्ष में यह भी कयास लगाया जा सकता है कि चूँकि यहाँ अधिकांश अन्य धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं इसलिए भी अनदेखी कर नदियों को मरने पर मजबूर किया जा रहा है। जबकि यहाँ रहने वाले आदिवासियों के लिए जल-जंगल ज़मीन ही जीवन है। और इनके अस्तित्व को मिटाने के लिए ही जल-जंगल ज़मीन में से एक नदियों को ख़त्म किया जा रहा है।

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