Breaking News
Home / News / Editorial / धनपशुओं के लिए हरमू नदी साबित हुई दुधारू गाय

धनपशुओं के लिए हरमू नदी साबित हुई दुधारू गाय

Spread the love

सभी सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुईं है। झारखण्ड की राजधानी रांची भी स्वर्णरेखा, हरमू, करम, जुमार, पोटपोटो समेत अन्य छोटी-बड़ी नदियों के किनारे होने से ही विकसित हुई या बसी। बुजुर्गों की कहानियों में यहाँ की पहाड़ियों में गाती, बलखाती, इठलाती नदियों के प्रवाह का जिक्र होता है। छोटी-छोटी पहाड़ियों और घुमावदार रास्तों के बीच स्वच्छ पानी के बहाव से यहाँ का सौंदर्य बढ़ जाता था। ये नदियां हमारी जीवनशैली का अहम हिस्सा है और समाज का इन नदियों से रागात्मक रिश्ता भी है। इन नदियों का महत्व धार्मिक और सांस्कृतिक के साथ-साथ कृषि, सिंचाई  एवं अन्य कार्यों की जल आपूर्ति हेतु भी विशेष महत्व था। धीरे-धीरे प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का खामियाजा यहाँ की नदियों को भी भुगतना पड़ा और रांची शहर के इतिहास को अपने हृदय में समेटने वाली नदियों का अस्तित्व खतरे में आ गया। नदियां सिकुड़ती रही और इनका प्रवाह मरता चला गया। सरकार द्वारा चलाए जा रहे सफाई एवं सौंदर्यीकरण अभियान को देखें तो लूट दिखती है और निराशा ही हाथ लगती है। स्थिति यह है कि इसे नदी तो दूर नाला भी कहना बड़ी बात होगी, नदियों की इस व्यथा पर आज पूरा शहर मौन है।

इन दिनों सरकारी महकमे में हरमू नदी सुर्ख़ियों में है। हालांकि, सेटेलाइट द्वारा इस नदी की ली गई तस्वीरों से साफ़ होता है कि वर्ष 2004 के पहले यह नदी विस्तृत और चौड़े पाट से होकर बहती थी। 10.40 किलोमीटर की दूरी तक बहने वाली इस नदी की चौड़ाई 25 मीटर से घट कर कई स्थानों पर एक मीटर से कम रह गयी है। हरमू नदी का अतिक्रमण पहले तो किनारे बसे लोगों ने किया, रही सही कसर जमीन दलालों ने पूरी कर दी। महज आधा किलोमीटर क्षेत्र में नदी के सीने पर अनेक मकान बना दिये गये। राज्य के मुख्यमंत्री महोदय ने कहा था कि “हरमू नदी को अमेरिका की विश्वविख्यात हडसन नदी जैसा बना देंगे”। रांची नगर-निगम की ओर से भी हरमू नदी को पुनर्जीवित करने और इसके सौंदर्यीकरण के लिए करोड़ों रुपये खर्च किये जा चुके हैं। पर हरमू नदी का क्या हश्र हुआ है, सब जानते हैं?

पिछले कुछ वर्षों में हरमू नदी को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए कई बार अभियान चलाये गये। साथ ही नदी को दोबारा जिंदा करने का प्रयास भी शुरू हुआ। मोहल्लों और घरों से निकलने वाले गंदे पानी को नदी तक पहुंचने से रोकने की पहल की गयी। इसके लिए ईगल इंफ्रा एजेंसी एजेंसी ने वर्ष 2015 से जीर्णोधार का काम शुरू किया। अब तक इस नदी की हालत सुधारने के नाम पर लगभग 52 करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं, लेकिन आज भी हरमू नदी की तस्वीर तो नहीं बदली, उल्टे नदी के प्राकृतिक बहाव को ही खत्म कर दिया गया। किनारों पर पत्थर लगाये गये हैं साथ ही नदी के किनारे-किनारे नाली बनाने और पैदल चलने हेतु ‘पाथ-वे’ बनाने का भी शुरू किया गया। परन्तु, यह कार्य भी बेहद धीमी रफ्तार से संचालित हो रही थी, जबकि काम की गुणवत्ता भी काफी खराब थी।

अब सरकार के तरफ से नई सिगुफा या यूँ कहे कि नया फरमान जारी हुआ है कि हरमू नदी की साफई एवं स्वच्छता की जिम्मेदारी एनजीओ को दी जाएगी। और यह एनजीओ नागरिकों के बीच जागरूकता अभियान के साथ-साथ चेतावनी लिखे साईंनबोर्ड की रेखा भी खींचेगी। रख-रखाव ईगल इंफ्रा ही करती रहेगी और शहर के अंदर करम चौक स्थित नदी के उद्गम स्थल से लेकर चुटिया में स्वर्णरेखा नदी से संगम स्थल तक नदी के दोनों ओर पाथ-वे बनायेंगे। कई स्थानों पर नदी की चौड़ाई भी की जाएगी। नदी के गंदे पानी को साफ करने के लिए 4 नये एसटीपी बनाया जाएगा।

जबकि नगर निगम के प्रस्तावित प्लान में कई खामियां है, जैसे मात्र 7 नालियों को ही सीवरेज से जोड़ा जाना है और 82 नालों को ऐसे ही छोड़ा दिया गया है। भारत सरकार की एजेंसी नेशनल इंवायरमेंटल इंजीनियर्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरि) के सर्वे में 82 नालियों को चिन्हित किया गया है। हरमू नदी में भट्टा मोहल्ला, करम चौक, चाला नगर, विद्यानगर, मुक्तिधाम पुल, हरमू बाईपास रोड पुल, फल मार्केट, हिंदपीढ़ी, कडरू पुल, रेडिशन ब्लू के आगे स्थित ब्रिज, रेलवे ब्रिज, रिसालदार नगर आदि का गंदा पानी आता ही रहेगा। हरमू नदी के जीर्णोद्धार की डीपीआर बनाने वाली एजेंसी ने धरातल पर जाकर सभी नालियों का सर्वे करने में कोताही की है। मुहल्लों से आने वाली नाली के गंदे पानी को साफ करने का कोई प्लान तैयार नहीं किया गया। नगर विकास विभाग और जुडको के अधिकारियों ने भी इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया। लेकिन जब तक सभी नालियों को अलग सीवरेज से जोड़ा नहीं जाता, तब तक गंदे पानी का ट्रीटमेंट नहीं होगा और सरकार का यह वादा भी जुमला ही बनकर रह जायेगा।

बहरहाल, पर्यावरण का सवाल सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था से जुड़ा होता है। पूँजीवाद को मुनाफ़े की अंधी हवस के लिए प्रकृति को भी निचोड़ने वाली यह सरकार रांची के हरमू नदी के अलावा अन्य मुख्य नदियों को बचाना चाहती है, तो सवाल उठता है कैसे? अबतक की कार्य प्रणाली से उनकी यह मंशा प्रतीत नहीं होती है। पूँजीवादी समाज में जनता को यदि “व्यवस्था-सजग” बनाए बिना “पर्यावरण-सजग” बनाया जाएगा तो होगा यह कि पूँजीवाद द्वारा चारो ओर भर दी गयी गन्दगी को जनता पर्यावरण बचाने की चिंता से सराबोर होकर थोड़ा-बहुत साफ़ करती रहेगी, ताकि पूँजीवाद उसे फिर गंदा कर सके। यानि “पर्यावरण-सुधारवाद” से प्रेरित लोग पूँजीवाद को थोडा और ‘ब्रीडिंग स्पेस’ या ‘ब्रीदिंग स्पेस’ मुहैया कराने से अधिक कुछ भी नहीं कर सकते। और रही बात सरकार की, तो वह जब भी ऐसे किसी जनमुद्दों पर घिरती है तो जल्दबाजी में धन का दुरुपयोग करने के लिए नई योजना जनता के समक्ष प्रतिरोपित कर देती है और अंत में परिणाम वही ढाक के तीन पात जैसा होता है। अब देखना यह है कि यह योजना कितनी सफल होती है।

  • 15
    Shares

Check Also

उत्तरी छोटानागपुर संघर्ष यात्रा के दौरान हेमंत सोरेन

उत्तरी छोटानागपुर संघर्ष यात्रा और हेमंत सोरेन

Spread the loveउत्तरी छोटानागपुर संघर्ष यात्रा में हेमंत सोरेन का बढ़ता क़द  “कहीं गैस का …

झारखंड के कुपोषित बच्चों के मिडडे मील थाली

कुपोषित बच्चों के मिडडे मील थाली से रघुबर सरकार ने चुराए अंडे

Spread the loveझारखंड के कुपोषित बच्चों के मिडडे मील थाली से साप्ताहिक मिलने वाले तीन …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: