पलामू जल संकट पर सरकार तमाशबीन

जल संकट से जूझता पलामू , दिव्यान्गता और मौत के बाद भी सरकार तमाशबीन

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पलामू जल संकट पर सरकार तमाशबीन

भाजपा के सत्ता के चार साल पूरे होने के बावजूद अब तक पलामू जल संकट से जूझ रहा है। यहाँ जल संकट की समस्या विकराल हो चुकी है। न सिर्फ शहरी क्षेत्रों में बल्कि ग्रामीण अंचलों का भी यही हाल है। वर्तमान में यहाँ की आबादी को शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं और जिलों के ग्रामीण इलाकों में सामान्यं वर्षा होने के बाद भी सिंचाई से संबंधित समस्याएँ गहराई हैं।

गौरतलब है कि आए दिन पलामू से सम्बन्धित खबरों में जल संकट की समस्या हमेशा अपना शीर्ष स्थान बरकरार रखी है। जिले के सटे ग्रामीण क्षेत्रों के पानी में काफी मात्रा में फ्लोराइड का अंश पायी जाती है, जिससे वहाँ की आवाम पीले दांत, दिव्यन्गता जैसी बीमारियों के साथ मरने को मजबूर हैं। दिलचस्प यह है कि जिले से सटे होने के कारण समाधान के कई ढपोरशंखी दावे तो हुए पर धरातल की स्थिति वही ढाक के तीन पात।

जल समस्या से सम्बन्धित यहाँ एक और महत्वपूर्ण मुद्दा है, जो रघुबर सरकार पर पलामूवासियों के प्रति संजीदगी पर गंभीर सवाल खड़े करती है। सामान्य वर्षा क्षेत्र होने के बाद भी यह सरकार यहाँ की जनता को उत्तम सिंचाई की व्यवस्था तो दूर सामान्य सिंचाई की व्यवस्था भी अब तक मुहैय्या करा नहीं पायी है। एक ओर जल संकट से निपटने के लिये वर्षाजल भण्डारण के लिए सरकार के पास डोभा प्रकरण के अलावा अन्य विशेष योजना तो है नहीं, तो दूसरी ओर सडकों पर जल-जमाव से बने प्राकृत डोभे से भी निपटने के लिए मौजूदा सरकार कोई रामबाण! उपाय नहीं कर पायी है। इन वजहों से बरसात के दिनों में पलामू की जनता का आम जीवन तो निश्चित रूप प्रभावित होता ही है, साथ-साथ साल के बाकि दूसरे मौसमों में भारी जल संकट का सामना करना पड़ता है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो पलामू की जल समस्या के पीछे मुख्य कारण सरकार की अनदेखी से पनपी कुव्यवस्था मानी जा सकती है। यह सरकार के लिए यहाँ की जल संकट समस्या को राम मंदिर की भांति केवल अपनी राजनीतिक एजेंडा भर मानती है। झारखंड में फिर से चुनावी सरगर्मी तेज हो रही है, अब देखना है कि मौजूदा भाजपा सरकार इस समस्या के निपटारे पर क्या दलील देती है या फिर आदतन झूठे कागजी तकरीरों के दम पर जनता को भ्रमित करने का खेल खेलती है?

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