झारखंडी धरती माँ की पुकार अपने भूमिपुत्रों को

भूमिपुत्रों को पुकार रही है झारखंडी धरती माँ!

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झारखंडी धरती माँ पुकार रही है अपने भूमिपुत्रों को

‘ सबका हाथ सबका विकास ’ द्वारा ‘अच्छे दिन’ लाने वाली रघुबर सरकार के सत्ता में आने के बाद, जहाँ एक ओर चन्द पूँजीपतियों की सम्पत्ति और मुनाफ़े में बेतहाशा वृद्धि हुई, तो वहीं इस वृद्धि की क़ीमत आदिवासी-मूलवासी शहरी-ग्रामीण मज़दूरों, छोटे किसानों और निम्न मध्यवर्गीय जनता को चुकानी पड़ी है। नौकरियों के मौक़ों में कटौती, बढ़ती महँगाई की तुलना में घटती आमदनी का असर आम जनता का जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ना ही था। नतीजटन बच्चों से बड़ों तक को कुपोषण झेलनी है।

इस सन्दर्भ में सरकार की क्या प्रतिक्रिया रही है? आम जनजीवन को राहत देने का कोई क़दम उठाने, बच्चों के लिए सन्तुलित पोषक आहार का इन्तज़ाम करने, इसमें लूट और भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के बजाय उसने क्या किया? पहले नेशनल न्यूट्रिशन मॉनिटरिंग ब्यूरो (एनएनएमबी) नामक संस्था, जो भोजन में पोषण की मात्रा का सर्वे कर रिपोर्ट प्रसारित करती थी, उसे भाजपा सरकार आते ही सबसे पहले बन्द कर दिया, ताकि इससे सम्बंधित किसी भी प्रकार का ब्यौरा समाज के सामने न आ सके।

इसका निष्कर्ष यह निकला कि यहाँ के स्कूली बच्चों में कुपोषण की स्थिति अति ग़रीब माने जाने वाले सोमालिया, इथिओपिआ, कांगो, जैसे सहारा के अफ़्रीकी मुल्क़ों से भी ख़राब है। यह हाल तब है जब इन स्कूलों में मिड-डे मील और बाल विकास जैसे अन्य कार्यक्रमों पर बड़ा ख़र्च करने का दावा किया जाता रहा है। इसी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसे प्रायोजित कार्यक्रमों में किस कदर लूट और भ्रष्टाचार का बोलबाला है। अबतक इस प्रदेश में भूख से कई दर्दनाक मौतें हो चुकी है।

स्पष्ट है कि, रघुबर सरकार की नीतियों से छात्र आत्महत्या करने को मजबूर है, ठेका मजदूर हासिये पर है, जनता अपनी  गवां चुकी है, स्कूलों को बंद कर छात्रों के भविष्य को पाषाण युग में भेज दिया गया है , घोटालो की श्रृख्ला बना दी गयी है, साम्प्रदायिक तनाव ने कईयों की बलि ले ली है, एक ही योजनायों पर कई बार जनता के गाढ़ी कमाई को बर्बाद किया गया है, पांचवीं अनुसूची लागू न कर जनता को ही नक्सली करार दिया जा रहा है, महंगाई से तो पूरा प्रदेश पनाह मांग रहा है, खुद ही शराब बेचने से नकली शराब बनाने वालों की चांदी हो गयी है, सम्पूर्ण प्रदेश के बच्चे फिर से ढिबरी तले पढने को मजूर हो गए हैं, क़ानून व्यवस्था की तो बात ही करनी बैमानी है – बेटी सुरक्षा तो दूर की बात है, आम जन अपनी जान की भीख मांगने पर मजबूर है।

अलबत्ता, देखे तो पूरी झारखंडी धरती माँ लहूलुहान है। मानो, झारखंडी धरती माँ आंसू भरी निगाहों से अपने झारखंडी भूमिपुत्रों से अपनी अवस्था पर सवाल पूछ रही हो कि कब तक अपने माँ की इस स्थिति पर चुप रहोगे? क्या झारखंडी भूमिपुत्रों में गैरत नाम की चीज बची है या नहीं? मानो झारखंड आन्दोलन में शहीद हुए एवं लड़ें उन तमाम वीरों की याद दिला रही हो? वह अपने बेटों से कह रही है उठो और प्रशोध लो, उखाड़ फेको उस सत्ता को जिसने उसका मुहाल कर दिया है। क्या यह धरती माँ की भूमिपुत्रों से इतनी सी इल्तजा भी नहीं कर सकती?

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