रघुबर सरकार का ‘ पोषण माह ’ का असलियत

पोषण माह : रघुबर सरकार का एक छल है

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[ads1] रघुबर सरकार का ‘ पोषण माह ’ का असलियत

आज झारखण्ड में मेहनतकश आबादी की भोजन और स्वच्छ पानी जैसी बुनियादी ज़रूरतें भी रघुबर सरकार पूरी नहीं कर पा रही हैं। स्थिति यह है कि यहाँ का आवाम भर पेट भोजन और साफ़ पानी के लिए तरस रहा है। परन्तु इसके बावजूद इस सरकार को प्रदेश में सब कुछ ठीक लग रहा है। उल्लेखनीय है कि पिछले एक साल में झारखण्ड में एक-एक कर भूख से 14 मौतें हो गयी और अधिकांश शिशु एवं बच्चे कुपोषण जैसी गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। कई प्रकाशित रिपोर्ट बताते हैं कि दुनिया भर में हर-रोज तकरीबन 18 हज़ार बच्चे और किसी बिमारी से नहीं बल्कि भूख से मर जाते हैं। इस संख्या का एक तिहाई हिस्सा यानी 6 हज़ार बच्चे भारतीय होते है। जिनमे झारखण्ड-बिहार जैसे राज्य के बच्चे अधिक हैं।

इस सच्चाई से आँख मूंद रखी भाजपा की रघुबर सरकार ने कुपोषण के खिलाफ कुपोषित बच्चों का उपचार कराने वाली माताओं का मानदेय घटा कर आधा कर दिया है। पिछले वित्तीय वर्ष तक कुपोषण उपचार केंद्र (एमटीसी) में इन माताओं का मानदेय प्रति दिन 200 रुपये था, लेकिन रघुबर सरकार ने इसे बढाने के बजाय इसे घटाकर 100 रुपये कर दिया। जबकि यह सरकार डींगे हांक रही है कि टैक्सों द्वारा कमाया गया अतिरिक्त पैसा यह जन-कल्याण योजनाओं में लगाती है।

समाजिक कार्यकर्ता किशोर कुमार पांडे का कहना है कि “एमटीसी में नितांत गरीब परिवारों के बच्चों के कुपोषित बच्चे आते हैं। यह वह मायें है जो अपने कुपोषित बच्चे के इलाज के दौरान अपना सारा वक़्त यहीं बिताती है, क्योंकि पिता को यहाँ रात में ठहरने की इजाजत नहीं।” डाल्टनगंज के चैनपुर में स्थित एमटीसी में सिर्फ 15 बिस्तर की ही सुविधा उपलब्ध है। जब राज्य में कृषि गतिविधि नहीं होती है, तभी केवल श्रमिक वर्ग के परिवार अपने बच्चों को पोषण की खुराक पूरा करने के लिए यहां आते हैं।

निश्चित रूप से कुपोषण ग़रीबी से जुड़ी हुई गंभीर समस्या है और यह कटु सत्य है कि जब माँ कुपोषित होती तभी बच्चा कुपोषण का शिकार होता है। कहने को तो यह सरकार अन्य ढपोरशंखी वचनों की तरह प्रदेश में भी ‘पोषण माह’ मना रही है। एक तरफ तो यह रघुवर सरकार अपने चेहेते पूंजीपतियों को सब्सिडी के रूप में धड़ल्ले से धन लूटाती है, लेकिन समाज को कुपोषण से आज़ादी दिलाने के नाम पर माताओं को देने के लिए 100 रूपए भी खर्च करना नहीं चाहती है। सरकार की इन जन-विरोधी नीतियों से भली-भांति समझा जा सकता है कि यह सरकार प्रदेश के कुपोषण से लड़ने हेतु कितने सजग हैं!

कुपोषण उन्मूलन के लिए जो नुस्खा यह सरकार और इस व्यवस्था के पैरोकार बुद्धिजीवी अपना रहे हैं, वह लोगों को गुमराह करने वाली है। रघुबर सरकार खुद को मानवीय दिखाने के लिए खैरात की भांति योजना (‘ पोषण माह ’) परोसती हैं। परन्तु सच्चाई तो यह है कि यह सरकार इस समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस उपाय ही नहीं करना चाहती है। आज यह सरकार मानवता के लिए पूरी तरह सर्वनाश की वजह बन चुकी है।

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