झारखण्ड में बरोजगारी अपने चरम पर

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झारखण्ड प्रदेश में जब से भाजपा की रघुवर सरकार आयी हैं तब से आबादी के अनुपात में रोज़गार के अवसर बढ़ने के बजाय लगातार कम होते जा रहे हैं। नियमित पदों पर ठेके से काम कराये जा रहे हैं और ख़ाली होने वाले पदों को भरा भी नहीं जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों का बन्द या निजी हाथों में बेचने का सिलसिला जारी है। भारी दबाव के बीच जो भर्तियां घोषित भी हुई हैं, उन्हें तरह-तरह के विचित्र कारणों से सरकार द्वारा वर्षों तक लटकाकर रखा गया हैं। भर्ती परीक्षाएँ होने के बावजूद, पास होने वाले उम्मीदवारों को नियुक्तियाँ नहीं दी जा रही है! करोड़ों युवाओं के जीवन का सबसे बहुमूल्य समय बिना नतीजे वाले भर्तियों के आवेदन भरने, कोचिंग व तैयारी करने, परीक्षाओं और साक्षात्कार देने में चौपट होता जा रहा है। विगत 4 वर्षों में भाजपा सरकार द्वारा लिए गए अर्थहीन फैसले का नतीजा है कि इन युवाओं के परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ता ही जा रहा है। राज्य के हज़ारों युवा डिप्रेशन जैसे रोगों के शिकार होते जा रहे हैं। मार्च 2018 में संसद में दी गयी जानकारी के अनुसार, 2014-16 के बीच देश में 26,500 युवाओं ने आत्महत्या कर ली थी।

नेताओं, मन्त्रियों, नौकरशाहों की सुरक्षा आदि पर ख़र्च होने वाले अरबों रुपये टैक्सों के रूप में हमारी जेबों से ही वसूले जाते हैं। तो क्या बदले में जनता को शिक्षा और रोज़गार की बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं मिलनी चाहिए? झारखण्ड राज्य में रघुवर सरकार जब से सत्ता में आयी है, तब से आये दिन विकास का बेसुरा राग अलापती रहती है। लेकिन सच्चाई यह है कि राज्य की दो बुनियादी ज़रूरतों, शिक्षा और रोज़गा की हालत बद से बदतर हो गयी है। दुनिया चाँद पर पहुँच चुकी है और यह सरकार गोबर को धन समझते हुए संरक्षण की बात कर रही है, वहीँ दूसरी तरफ यही सरकार शिक्षा के विकास के नाम पर प्रदेश की लगभग 12500 स्कूलों को बंद करने की फरमान सुना चुकी है। ख़ैर स्कूल मर्ज की बात अगले लेख में करेंगे, आज बात करते हैं रोजगार की। लेकिन यह फेहरिस्त इतनी लम्बी है कि इसके अक्स को एक लेख में अंत कर पाना संभव प्रतीत नहीं हो रहा। इसलिए इसे एक से अधिक लेखों के माध्यम से प्रकाशित किया जाएगा।

श्रम ब्यूरो की सर्वेक्षण के अनुसार, मोदी राज में जहाँ भारत की बेरोजगारी दर पांच साल के उच्चतम स्तर पर है। तो वहीं CMIE के डाटा पर विश्वास करें तो, झारखण्ड की बेरोजगारी दर अब 8 प्रतिशत के आंकड़े के पार पहुँच गयी है। यह आंकड़े रघुवर सरकार के विकास के दावों-वादों को दरकिनार करते हुए बेरोजगारी को इस प्रदेश की पहचान बना गयी है। इस दुखती रग को कुछ विशेष आंकड़ों के माध्यम से टटोलने का और प्रयास करते हैं। विधानसभा में 4 अप्रैल 2018 को पेश किए गए अपने जवाब में सरकार ने माना है कि झारखण्ड के पुलिस विभाग में 25,927 पद रिक्त हैं। जबकि JSCC परीक्षा के प्रकाशित विज्ञापन, 2015 के आलोक में जुलाई 2018 तक नियुक्तियां संभव नहीं हो पायी है। सरकार ने ही नवंबर 2016 में परीक्षा की निर्धारित तिथि से मात्र 3 सप्ताह पहले ही इसे स्थगित कर दिया था और उसके अगले साल फरवरी माह में वेकैंसी संबंधी अधिसूचना को सरकार द्वारा वापस ले लिया गया था।

स्किल झारखण्ड योजना की सच्चाई

अब 2015 में सरकार द्वारा ही लायी गयी योजना स्किल झारखण्ड को टटोलते है। इस योजना के तहत सरकार द्वारा स्थापित किए गए चार एक्सीलेंस सेंटरों का इन्टरनेट पर किसी भी प्रकार का रिकॉर्ड या डाटा उपलब्ध नहीं है। न ही इसका किसी प्रकार फायदा बेरोजगारों को होता दिख रहा है क्योंकि सरकार के दावों के इतर विभिन्न लिंग एवं किसी भी आयु वर्ग को फ़ायदा तो दूर, घाटा ही होता दिखा है। और इस बाबत न ही मुख्यमंत्री या किसी सरकारी अधिकारी का कोई अपडेट ही आया है। ज्ञात रहे कि, रघुवर सरकार ने मोदी जी के भांति झारखण्ड में नई नौकरियों के श्रृजन की बात जोर-शोर से की थी और लगातार करती ही आ रही है, परन्तु सच्चाई यह है कि राज्य में बेरोजगारी दर साल दर साल घटने के बजाय बढ़ रही है। सितम्बर–दिसंबर 2017 में प्रकाशित आंकड़े के अनुसार जहाँ प्रदेश में 12,02,000 लोग बेरोजगार थे, तो वहीं जनवरी–अप्रैल 2018 में यह बढ़कर 14,54,000 हो गई है। …जारी

नोट : अगली लेख में शिक्षा के क्षेत्र में रोजगार की स्थिति एवं रोजगार के अन्य आयामों को समझने-समझाने का प्रयास रहेगा…

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