कानूनों में हो रहे संशोधनों से झारखण्डी दलित समाज खफा

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हमारे देश में राजनीतिक दलों द्वारा न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का ढोल लगातार पीटा जाता है, लेकिन हालिया कुछ निर्णयों से ये स्पष्ट हुआ है कि आरएसएस की भाजपा सरकार अपने जजों को न्यायालयों में नियुक्ति देकर अपने तमाम मंशागत निर्णयों को पारित करवा रही है। हाल ही में, जज लोया प्रकरण में भी सुप्रीम कोर्ट ने जो भूमिका अपनायी, वह इस बात की पुष्टि करती है। एससी/एसटी एक्ट में बदलाव का जब फ़ैसला सुनाया गया था तो उससे पहले कई महीनों तक देशभर में बेरोज़गार युवकों द्वारा प्रदर्शन लगातार चल रहा था। इस एक फ़ैसले ने ना सिर्फ़ उन प्रदर्शनों को दबा दिया, बल्कि नौजवान-मेहनतकश बेरोजगार युवायों के बीच जातिगत दीवार और बड़ी कर दी।

2 अप्रैल को देशभर में इस क़ानून में बदलाव के खि़लाफ़ जब प्रदर्शन हुए तो तमाम उच्च-जातीय लोगों ने दलितों पर हमले किये। मध्यप्रदेश के ग्वालियर में तो बाक़ायदा पिस्तौल लेकर दलितों को गोलियाँ मारता व्यक्ति सामने आया। और एससी/एसटी एक्ट में बदलाव के फ़ैसले से जो खेल मोदी सरकार खेलना चाहती थी, वो पूरा होता प्रतीत हुआ। ठीक ऐसा ही हाल झारखण्ड में देखा गया जब जगह-जगह अम्बेडकर जी की प्रतिमाओं को तोड़े जाने का भी मामला प्रकाश में आया। इस क़ानून के कमजोर होने की वजह से ही भूमि अधिग्रहण संशोधन अधिनियम एवं ठेका क़ानून आदि में आसानी से  संशोधन कर पाना रघुवर सरकार के लिए संभव हो पाया। ऐसी परिस्थिति में भी भाजपा के सीटों से जीते हुए तमाम विधायक एवं लोकसभा सदस्य ने जिस प्रकार चुप्पी साधी रखी, वह साबित करती है कि इन्हें एससी/एसटी जमात की कोई फ़िक्र नहीं।

इन्हीं ख़बरों के बीच धनबाद के जेएनएन में रविदास समाज संघर्ष समिति ने शुक्रवार को भाजपा के सीटों से जीते अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के विधायकों एवं सांसदों का पुतला दहन किया। इस कार्यक्रम के दौरान समिति ने सांसदों पर आरोप लगाया कि ये सभी एससी-एसटी के घोर विरोधी हैं। जबकि समिति संस्थापक दिलीप राम का मानना है कि “एससी-एसटी समाज के मान-सम्मान के प्रति सजग रहने के लिए ही बाबा साहेब ने संसद में भी आरक्षण की व्यवस्था की थी। परन्तु इसके उलट ये सभी सांसद आरक्षण का लाभ लेकर संसद भवन पहुंचने के बाद एससी-एसटी के पक्ष में आवाज उठाना तो दूर, इन्होने इस पर बोलना तक बंद कर दिया है। ये सभी आरएसएस के समक्ष हथियार डाल दिए हैं। ये सांसद भाजपा द्वारा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति पर लगातार हो रहे हमले एवं अधिकारों के लगातार हो रहे हनन के बावजूद भी चुप हैं। साथ ही इसे सही ठहराने का भी प्रयास कर रहे है”। आगे वे कहते है कि “यह तो बस शुरुआत भर है, समिति इनके खिलाफ हल्ला बोल कार्यक्रम चलाएगी। यह समिति इनके सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन का विरोध खुलकर नहीं करने के कारण भी अति क्रोधित है”।

बहरहाल, भाजपा और आरएसएस क़ानूनों को निष्प्रभावी बनाना चाहती है। ऐसे में सभी ग़रीब मेहनतकश आबादी और इंसाफ़पसन्द लोगों को इस क़ानून में परिवर्तन के विरुद्ध एकजुट होकर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति पर बढ़ते अत्याचारों के खि़लाफ़ संघर्ष करने की ज़रूरत है। क्योंकि ऐसा नहीं करने पर ये एक-एक कर, कभी दलित, कभी मज़दूर, तो कभी महिलाओं के हक़ों के संरक्षण के लिए बने क़ानूनों को निष्प्रभावी बनाते रहेंगे और आम जनता के हकाधिकार छीने जाते रहेंगे। एससी/एसटी क़ानून 1989 में बदलाव के कारण अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति पहले से ही दमन-उत्पीड़न झेल रही है। अबकी बार हुए संशोधन से यह आबादी और भी अँधेरे के गर्त में धकेल दी जायेगी। हमें इसके विरुद्ध एकजुट होना पड़ेगा। ये जि़म्मेदारी आज देश के बेरोजगार युवाओं के साथ-साथ तमाम बुद्धिजीवियों के कन्धे पर है। नहीं तो हमारा देश को भविष्य में गर्त में जाने से कोई भी ताक़त नहीं बचा पाएगी।

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