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भाजपा का दोहरा रवैया: भूख से हुई मौत पर भी पक्षपात!

भाजपा का दोहरा रवैया: भूख से हुई मौत पर भी पक्षपात!

हमारे देश को कृषि प्रधान देश की उपाधि प्राप्त है, परन्तु इस देश कि विडम्बना यह है कि जब से देश में भाजपा की सत्ता आयी है तब से भारत के कृषि प्रधान देश की गौरवपूर्ण उपाधि पर ग्रहण लग गया है। देश की राजधानी दिल्ली के साथ-साथ पूरा देश जिस दिन भूख से हुए मौत तीन बच्चियों की ख़बर पढ़ रहा था, उन्हीं अखबारों में, वही पाठक ‘मध्य प्रदेश में 55 लाख टन गेहूं सरप्लस’ होने की सुर्ख़ियों को भी पढ़ रहे थे।

ज्ञात हो कि दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल के बाद लालबहादुर शास्त्री अस्पताल ने भी अपने पोस्टमॉर्टम में इसकी पुष्टि कर दी है कि दिल्ली में भूख से मृत्यु के काल में गयीं 3 बच्चियों के पेट में अन्न का एक भी दाना नहीं था। देश को शर्मसार करने वाली यह घटना तब और भयावह लगी, जब भाजपा शासित झारखण्ड प्रदेश से भी 24 जुलाई को बिरहोर जनजाति जैसी संरक्षित जाति से एक बिरहोर की भी भूख से हुई मृत्यु सुर्ख़ियों में बनी रही।

चूँकि, यह दिल्ली का मामला है और वहां भाजपा की सरकार नहीं है इसलिए केंद्र सरकार तुरंत हरकत में आई और इन तीन बच्चों की मौत की जाँच के आदेश दे दिए। साथ ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने इस घटना का स्वत: संज्ञान लेते हुए दिल्ली सरकार और महिला एवं बाल विकास मंत्रलय से चार हफ्ते में जवाब मांगा। सरकार किसी की भी हो, ऐसी शर्मसार कर देने वाली घटनाओं की जाँच निसंदेह एवं अतिशीघ्र होनी चाहिए, परन्तु पूरे देश को एक दृष्टी से देखने की भी आवश्यकता है।

दिल्ली में घटित घटना के बाद एक-एक कर सारी एजेंसियां सक्रीय होती दिखी। केंद्रीय उपभोक्ता मामलों, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री रामविलास पासवान ने गुरुवार को ही जानकारी दे दी कि प्रारंभिक पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार यह मौतें कुपोषण या भूख व उससे उत्पन्न विकारों के कारण हुई बताया गया है। भाजपा सदस्यों ने तो लोकसभा में इस मामले को उठाते ही, इस घटना के लिए दिल्ली सरकार को जिम्मेदार ठहरा दिया। सांसद रमेश विधूड़ी, प्रवेश वर्मा और महेश गिरी ने दावा तक कर दिया कि दिल्ली में राशन घोटाला हुआ है।

बहरहाल, सवाल तो यह है कि यही तत्परता केंद्र में भाजपा सरकार अपने भाजपा शासित राज्यों में क्यों नहीं दिखाती है? इनके द्वारा शासित राज्यों में चाहे कितनी भी बड़ी घटनाएं हो जाए, पर वो इन्हें नगण्य ही क्यों प्रतीत होती है? क्या दिल्ली से कम मार्मिक घटना थी झारखण्ड में, जहाँ आठ दिनों से भूखी बच्ची संतोषी तड़प-तड़प का प्राण त्यागने को मजबूर हो गयी? क्यों नहीं केंद्र ने इस घटना में आगे बढ़कर जाँच करवाने का कोई प्रयास किया? सवाल यहीं नहीं ख़त्म हो जाते हैं। इसी राज्य में एक-एक कर अबतक भूख से कुल 13 गरीब लोगों की मृत्यु हो गयी है। संरक्षित जनजाति का होने के बावजूद भी 24 जुलाई को राजेंद्र बिरहोर की भूख से मौत हो गयी। क्यों नहीं जाँच की यही तत्परता केंद्र और राज्य की रघुवर सरकार ने झारखंड में दिखाई? क्यों मृतक की पत्नी के बार-बार कहे यह जाने के बावजूद कि उसके घर में तीन दिनों से कोई चुल्हा तक नहीं जला है, सरकारी अधिकारियों ने पोस्टमार्टम करवाना भी जरूरी नहीं समझा और बिना जाँच के ही इस भूख से हुई मौत को बीमारी से हुई मौत बता कर पल्ला झाड़ लिया।

देश और झारखण्ड राज्य की पृष्ठभूमि पर यह एक चुभता हुया प्रश्न है पर क्या इस प्रश्न का उत्तर कोई भाजपा मंत्री या नेता देंगा? क्या यह मामला भी लोकसभा में गूंजेगा? क्या इस घटनाक्रम पर राज्यसभा में भी प्रश्न उठाये जायेंगे?

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