Untitled-1

चीनी मोबाइल को देश से बाहर भगाने वाले मोदी आखिर क्यों ला रहे हैं चीनी बैंक

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on telegram
Share on whatsapp

 

क्या देश में कई सालो से आरएसएस और उसके आनुषंगिक संगठनों का चीन के उत्पादों का बहिष्कार करना झूठा था? अब ये प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा लाये जा रहे चीनी बैंक का विरोध क्यों नहीं करते। क्या अब इन्होंने देश भक्ति का कंबल उतार फैंका है?

मोदी जी का हमेशा चीन जाने के रहस्यों से अब पर्दा उठने लगा है। मोदी जी चीनी राष्ट्रपति से किये अपने वादे पूरा करने लगे हैं। रिजर्व बैंक ने बैंक ऑफ चाइना को भारत मे बैंक खोलने की अनुमति दे दी है। पहली नजर में तो यह कोई बड़ी बात नही लगती क्योंकि यहाँ पहले से ही लगभग 45 विदेशी बैंकों की शाखाए संचालित हैं। परन्तु यकीन मानिए बैंक ऑफ चाइना अन्य सभी विदेसी बैंको से काफी अलग है। चीन का यह बैंक वहां के बड़े सरकारी बैंकों में से एक है। बाज़ार पूंजीकरण के दृष्टीकोण से यह बैंक दुनिया के बड़े बैंकों में शामिल है। बैंक ऑफ चाइना कोई साधारण बैंक नही है। यह  चीन सरकार द्वारा चलाई जा रही इनवेस्टमेंट कंपनी ऑफ़ चाइना सेंट्रल के अधीन काम करती है। यह बैंक का फैलाव 50 देशों में है और चीन के वन बेल्ट, वन रोड योजना के तहत आता हैं। बैंक ऑफ़ चाइना की उपस्थिति ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, आयरलैंड, फ्रांस, जर्मनी, इटली, मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका, सिंगापुर, जापान समेत कुल 27 देशों में है।

बैंक ऑफ चाइना ने जुलाई 2016 में भी रिजर्व बैंक से बैंकिंग लाइसेंस का आग्रह किया था लेकिन उसी वक्त बैंक पर पहले ही इजरायल को निशाना बनाने वाले आतंकी संगठन हमास को फंडिंग करने के आरोप लगे थे। हालांकि, बैंक ने साफ तौर पर इन आरोपों को नकार दिया था और कहा था कि हम संयुक्त राष्ट्र के एंटी मनी लॉन्डरिंग और एंटी टेररिस्ट फंडिंग नियमों और शर्तों का पूरी तरह पालन करते हैं। लगता है इस जवाब से रिजर्व बैंक संतुष्ट हुआ तभी उसे बैंकिंग लाइसेंस प्रदान किया गया है।

वैसे ये तो मोदीजी ही बता सकते हैं कि आखिर पिछले दो सालो में ऐसा क्या हुआ जिसके कारण बैंक ऑफ चाइना भारत में अपनी शाखा खोलने के लिए बेसब्री से तैयार हो गया। लगता है भारत में नई दिवालियापन और बैंकरप्सी संहिता (आईबीसी) को मंजूरी मिल जाने से अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और उधारदाताओं का अचानक ही भारत मे दिलचस्पी जागृत हो गयी है। आज के कई अखबारों की सुर्खियाँ है कि सहारा का 75 प्रतिशत भागीदारी वाला न्यूयॉर्क स्थित होटल का सौदा हो गया है और कल ही बैंक ऑफ चाइना को अनुमति भी दे दी गयी। यह महज संयोग नही बल्कि सहारा जिस विदेशी कर्जदाता बैंक से अपना विदेशी संपत्ति बेचने के लिए बात कर रहा था वह बैंक ‘बैंक ऑफ चाइना ही था’।

OBOR यानी वन बेल्ट वन रोड परियोजना, विश्व व्यापार को अपने कब्जे में करने के लिए चीन द्वारा चलाईं जा रही सबसे महत्वाकांक्षी योजना है। इसके अंतर्गत यह कम्पनी पाक अधिकृत कश्मीर से रोड गुजारने वाली है। शुरुआत से ही भारत इस परियोजना के विरोध में था पर बैंक ऑफ चाइना को यहाँ बैंक खोलने की अनुमति देना दिखाता है कि मोदीजी अब अपने पुराने स्टैंड से पीछे हट रहे हैं और जनता को बताना भी गवारा नहीं समझ रहे है।

OBOR  योजना को इसलिए भी खतरनाक माना जा रहा है क्योंकि इस योजना के तहत चीन इससे जुड़े देशों को इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के लिए पहले कर्ज देता है और बदले में उन देशों को योजना के सम्पूर्ण निर्माण का कॉन्ट्रैक्ट चीनी कंपनियों से ही कराना होता है। इससे चीन का दबदबा उन देशों में बढ़ता जाता है।

बैंक ऑफ चाइना ने भारत के पॉवर सेक्टर में बड़े पैमाने पर अडानी, रिलायंस, टाटा पॉवर जैसे कम्पनियो को लोन दे रखा है और ये भी हो सकता है कि इसके बदले में भारत के बहुमुल्य खनिज एवं संसाधनों को इन उद्योगपतियों ने गिरवी रख दिया हो। इसलिए भारत मे बैंक ऑफ चाइना के पदार्पण को साधारण तो कतई नहीं समझा जा सकता है। इसके पीछे छिपे अनेक रहस्यों पर से पर्दा भविष्य में धीरे-धीरे उठेगा और कई चौकाने वाले तथ्य उजागर होंगे।

Share on facebook
Share on twitter
Share on linkedin
Share on telegram
Share on whatsapp

This Post Has One Comment

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.