हम अब और तमाशबीन नहीं बने रह सकते!

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वैसे तो झारखण्ड में हर रोज़ ही हम ऐसी घटनाओं के गवाह बनते हैं जो रघुवर सरकार की सच्चाई को हमारी ऑंखों के सामने उजागर करती हैं, लेकिन पिछले कुछ महीनों के दौरान प्रदेश के पैमाने पर रघुराज व्यवस्था जिस कदर नंगी हुई है, उसे बताने के लिए अब रंग-छन्द की ज़रूरत नहीं रह गयी है। आज इस पूरी आदमख़ोर मुनाफाख़ोर व्यवस्था की क्रूर और अमानवीय सच्चाई सीधे हमारे सामने खड़ी है – एकदम निपट नंगी सच्चाई! और इसलिए इसे उतने ही सीधे शब्दों में आपके सामने रख देना ही आम जनता की वेबसाइट के तौर पर ‘झारखण्ड खबर’ आज सबसे ज़रूरी समझता है। पिछले कुछ दिनों में हुई घटनाओं पर एक नज़र डालते ही यह साफ होने लगता है कि झारखण्ड में भाजपा के रघु नंदन श्री रघुवर सरकार अब अपनी सड़ी-गली व्यवस्था की घिनौनी सच्चाइयों पर पर्दा डालने की भी ज़रूरत नहीं महसूस करती है। वह जान चुकी है कि समूची भगवा सभ्यता की घृणित सच्चाई अब जनता के सामने एकदम साफ है। इसे छिपाने की कोशिश करना बेकार है। अब उसकी उम्मीदें भगवावाद को लेकर आम जनता के बीच कोई भ्रम फैलाने पर नहीं टिकी हैं। अब उसकी उम्मीदें इस बात पर टिकी हैं कि जनता पस्तहिम्मती, पराजयबोध और हताशा में जीते हुए इस अफसोसनाक हालत को ही नियति समझ बैठेगी और इसे स्वीकार कर लेगी। कहने की ज़रूरत नहीं है कि यह उसकी ग़लतफहमी है। आइये कुछ प्रातिनिधिक घटनाओं पर एक नज़र डालें।

पहली घटना– लगभग यह वही समय है जब मोदी जी कर्नाटक में जनता को इतिहास का बेतुका पाठ पढ़ा रहे थे और पूरी दुनिया को इतिहास में अपनी पैंठ का बोध करा रहे थे, इधर झारखण्ड में महालेखाकार (एजी) कंबल घोटाले की फाइलों को खंगाल या ऑडिट कर कई तरह के फर्जीवाडे का खुलासा भी कर रही थी। ‘एजी’ ने अपने पड़ताल में पाया कि कंबल निर्माण में पानीपत से ऊनी धागे की ढुलाई के लिए  जारी रोड परमिट और बिल में अलग-अलग ट्रकों के नंबर इस्तेमाल हुए हैं। यूँ कहें कि एक ही माल को एक ही समय में दो ट्रकों ने ढोये। 27 से 30 जून 2017 के दौरान इस तरह के आठ मामले पकड़ में आये जिनमें 480 क्विंटल ऊनी धागे की ढुलाई हुई है। जानकारी के लिए बता दूं कि पूर्व में अंतर्राज्यीय व्यापार एक्ट में माल को अन्य राज्य से झारखण्ड राज्य में मंगवाने या पहुँचाने के क्रम में रोड परमिट की अनिवार्यता थी। जीएसटी एक्ट पारित होने से पूर्व वैट एक्ट के नियमानुसार, अन्य राज्य से झारखंड राज्य में माल मंगाने के लिए निर्गत रोड परमिट को ‘सुगम-जी’ कहा जाता था जिसपर अन्य राज्यों से आने वाले ट्रक का नंबर अंकित होता था।

दूसरी घटना – एक तरफ  झारखंड उच्च न्यायालय ने सरकार की अपील खारिज करते हुए आदेश दिया कि राज्य सरकार को चार माह के भीतर शिक्षकों की नियुक्ति के लिए काउंसेलिंग कराना पड़ेगा। वहीँ दूसरी तरफ झारखण्ड बोर्ड की मैट्रिक व इंटर की एक उत्तरपुस्तिका की जांच परीक्षक चार से पांच मिनट में कर रहे है। आपको यह जान कर और आश्चर्य होगा कि इसी अवधि में परीक्षक कॉपी का मूल्यांकन, अंकों के योग से लेकर मार्क्स फाइल पर चढ़ाने तक का प्रक्रिया पूरी कर ले रहे हैं। आपको जानकारी दे दें कि सीबीएसइ बोर्ड की एक उत्तरपुस्तिका की जांच करने में परीक्षकों को तकरीबन 15 मिनट का समय लगता है। आदेशानुसार परीक्षकों को 10 बजे से पहले मूल्यांकन केंद्रों पर पहुंचना है और चार बजे तक मूल्यांकन कार्य पूरा करना है, पर इसका पालन भी दुरुस्त तरीके से पूरा नहीं हो पा है। प्रदेश की दैनिकों की माने तो प्रदेश के कई हाइस्कूलों में परीक्षक लगभग 12.30 बजे तक पहुँच रहे हैं और वे मात्र साढ़े तीन घंटे में ही छह घंटे का मूल्यांकन कार्य पूरा कर ले रहे हैं। अब आप ही बताएं क्या हमारे परीक्षक किसी सुपरमैन से कम है!

तीसरी घटना – प्रदेश झारखण्ड में मौसम के बदलाव ने झारखंडवासियों को एक बार फिर तेज गर्मी से राहत तो पहुंचा दी है और मौसम ठंडा हो गया यदि कुछ ठंडा नहीं हुआ तो धनबाद के रामभोल भाई की परिवारिक सरगर्मियां। उनकी पत्नी रूठ कर मायके चली गयी है क्योंकि घर में शौचालय नहीं  है। कह कर गयीं है, “जबतक शौचालय नहीं बनवाओगे तबतक ससुराल नहीं आउंगी” ठीक हाल में ही बनी फिल्म टॉयलेट एक प्रेम कथा की तरह। रामभोल ने मामले की शिकायत और अपनी पीड़ा मुख्यमंत्री जनसंवाद में दर्ज कराई है। रामभोल ने अपने इस शिकायत के माध्यम से प्रदेश के मुख्या को अवगत कराया है कि वे दो वर्षों से प्रधानमंत्री आवास और शौचालयय के लिए अपने पंचायत के मुखिया मधु सिंह के पास लगातार फरियाद कर रहे हैं परन्तु उन्हें योजना का लाभ अबतक नहीं मिला है। मुखिया पति उनसे दो हजार रुपए की मांग की हैं। वहीं, दूसरी तरफ मधु सिंह (‘मुख्या’ सम्बंधित पंचायत) घूस मांगने के आरोप को सिरे से नकार रहीं हैं। उनका कहना है कि लाभुक की सूची में रामभोल का नाम ही नहीं है। घूस की संस्कार की जड़ें झारखण्ड प्रदेश में कितनी अंदर तक धंसी है ये बताना आवश्यक नहीं समझता क्योंकि इससे आप भली भाँती परिचित हैं।

ऐसे में इस प्रदेश की जनता के सामने यह सवाल है – क्या हम हो रहे भ्रस्टाचार को स्वीकार कर लेंगे? क्या पूरी तरह नग्न हो चुकी व्यवस्था को हम अपने आने वाली पीढ़ियों को बर्बाद करने देंगे? क्या हम अपनी ही बर्बादी के तमाशबीन बने रहेंगे? या फिर हम उठ खड़े होंगे और अन्धी हवस पर टिकी इस मानवद्रोही, आदमख़ोर व्यवस्था को तबाहो-बर्बाद करेंगे? या फिर हम संगठित होकर इस अन्याय और असमानता का ख़ात्मा करने और न्याय और समानता पर आधारित एक नयी समाजवादी व्यवस्था का निर्माण करने की तैयारियाँ करने में जुट जायेंगे।

आज ये दोनों ही रास्ते हमारे सामने हैं। एक रास्ता दासवृत्ति के शिकार रीढ़विहीन कायरों और बुजदिलों का रास्ता है, जो कहता है कि सबकुछ पचा लो, सबकुछ स्वीकार लो, पीठ झुकाकर कोड़े खाने के लिए तैयार खड़े रहो! दूसरा रास्ता उस इंसानियत वर्ग का रास्ता है, जो पूरी दुनिया को अपने बलिष्ठ हाथों से गढ़ता है, रचता है और अपने मज़बूत-चौड़े कन्धों पर सभ्यता के रथ को खींचकर यहाँ तक लाया है। यह रास्ता है इन्कलाब का है!

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