Welcome to Jharkhand Khabar   Click to listen highlighted text! Welcome to Jharkhand Khabar
  TRENDING
मुफ्त कोरोना वैक्सीन देने का वादा करने वाली भाजपा अपने नेता को ही नहीं बचा सकी
जेलों में बंद कैदियों को सम्मान देने के साथ उनके कुशलता का उपयोग भी करना चाहते हैं मुख्यमंत्री
कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड -किसानों के राहत के नाम पर आवंटन 1 लाख करोड़ से होगा कॉपोरेट घरानों को फायदा !
समीक्षा बैठक में दिए गए निर्देशों के अनुपालन में क्या हुआ, 15 दिन में रिपोर्ट दें
पत्थलगढ़ी के दर्ज मामलों को वापस लेकर मुख्यमंत्री ने राज्य को बिखरने से बचाया
दबे-कुचले, वंचितों के आवाज बनते हेमंत के प्रस्ताव को यदि केंद्र ने माना तो नौकरियों में मिलेगा आरक्षण का लाभ
टीआरपी घोटाला : लोकतंत्र का चौथे खम्भे मीडिया ने अपनी विश्वसनीयता खोयी
सर्वधर्म समभाव नीति पर चल राज्य के मुखिया पेश कर रहे सामाजिक सौहार्द की अनूठी मिसाल
खाद्य सुरक्षा: आरोप लगा रहे बीजेपी नेता भूल चुके हैं – जरूरतमंदों को 6 माह तक खाद्यान्न देने की सबसे पहली मांग हेमंत ने ही की थी
Next
Prev

झारखंड स्थापना दिवस की शुभकामनाएं

hemant soren

झारखण्ड विधानसभा उपचुनाव में विपक्ष एक साथ

 

यदुनंदन मिश्र

यूँ तो पिछले कई वर्षों से भारतीय समाज एक भीषण सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक और नैतिक संकट से गुज़र रहा है, परन्तु अप्रैल के महीने में सुर्खियों में रही कुछ घटनाएँ इस ओर साफ़ इशारा कर रही हैं कि यह चतुर्दिक संकट अपनी पराकाष्ठा पर जा पहुँचा है। जहाँ एक ओर कठुआ और उन्नाव की बर्बर घटनाओं ने यह साबित किया कि फ़ासिस्ट दरिंदगी के सबसे वीभत्स रूप का सामना औरतों को करना पड़ रहा है वहीं दूसरी ओर न्यायपालिका द्वारा असीमानन्द जैसे भगवा आतंकी और माया कोडनानी जैसे नरसंहारकों को बाइज्जत बरी करने और जस्टिस लोया की संदिग्ध मौत की उच्चतम न्यायालय द्वारा जाँच तक कराने से इनकार करने के बाद भारत के पूँजीवादी लोकतंत्र का बचा-खुचा आखिरी स्तम्भ भी ज़मींदोज़ होता नज़र आया। कहने की ज़रूरत नहीं कि ये सब फ़ासीवाद के गहराते अँधेरे के ही लक्षण हैं। हालात चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि किस तरह मात्र डेढ़ साल के लिए किस तरह झारखण्ड के दो विधान सभा क्षेत्र सिल्ली और गोमिया को उपचुनाव में धकेला गया साथ ही झारखण्ड प्रदेश की जनता पर साल भर में दो बार चुनावी आर्थिक बोझ लादा गया। ये देखा जा सकता है कि संकट के इस अँधेरे को संविधान, कानून और आधिकारिक संस्थाओं पर भरोसा टिकाने की बजाय जनबल के बूते ही चीरा जा सकता है।

जैसा कि पहले बताया गोमिया और सिल्ली विधानसभा के वोटर मात्र डेढ़ साल के लिए 28 मई को अपना विधायक फिर चुनेंगे। मसलन इन दोनों ही क्षेत्रों में चुनावी तपिश में लगातार इजाफा देखने को मिल रही है। इसका जायजा लेने के लिए ‘झारखण्ड खबर’ की टीम ने गोमिया विधानसभा क्षेत्र का मुआइना कर यह निष्कर्ष पर पहूँची कि यहां के वोटर विकास के नाम पर चुनी हुई सरकार से खासे नाराज चल रहे हैं। वे कहते हैं यहाँ वोट से पहिले नोट का खूब खेला चल रहा है। हमलोग भी संकल्प लिए हैं, नोट वाले को नहीं, यहाँ के मूलवासियों की सूद लेने वाली पार्टी को वोट करेंगें, काम करने वाले को ही वोट देंगे। जातीय समीकरण से इतर इस बार प्रदेश की विकास मुख्य मुद्दा बना हुआ है। वहीँ प्रत्याशियों की अपनी पकड़ वाले जातिगत वोटों पर तो नजर है ही लेकिन इसे खुलेआम भुनाने की बजाय वोटरों के बीच वे विकास कार्यों की दुहाई दे रहे हैं। सिल्ली में जहां आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो और झामुमो की सीमा देवी के बीच सीधा मुकाबला है, वहीं गोमिया में झामुमो की बबिता देवी, आजसू के लंबोदर महतो और भाजपा के माधवलाल सिंह के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होगा। इन विधानसभा क्षेत्र में कोयला है, पानी है, बिजली का उत्पादन होता है, खाली जमीन है, मजदूर भी हैं, लेकिन फैक्टरियां नहीं लगीं। बेरोजगारी की समस्या विकराल रूप धारण किए हुए है। रोजगार की तलाश में लोग दूसरे राज्यों में भटक रहे हैं।

बंगाल बार्डर से सटे पहाड़ की तलहटी में दो गांव बसे हैं। लोग कहते हैं कि कभी यहां नक्सलियों का राज था, झामुमो के विधयक की तत्परता से अब यहाँ शांति है। हिसिम के ग्रामीण बताते हैं कि नक्सली अक्सर खाना बनाने के आदेश के साथ गांव में आ धमकते थे। नहीं मानने वालों के साथ मारपीट करते थे। कई साल पहले मुखिया सुखदेव मुर्मू की हत्या भी कर दी थी। अब इन समस्याओं से मुक्ति मिल गई है। त्रियोनाला ग्रामीण बताते हैं कि नक्सली तो अब नहीं आते, लेकिन मलेरिया और हाथी का प्रकोप अब भी जारी है। सरकारी सेवा नदारद दिखती है। गांव वाले उसी को वोट देंगे, जो इससे निजात दिलाने की बात करेगा। ग्रामों में हेमंत सोरेन कि भाषणों की चर्चा जोरों पर है जिसमे हेमंत कहते हैं कि भाजपा के यहां दो प्रत्याशी आप के सामने कमल और केला की मुखौटा ओढ़ खड़े हैं। केले वालों ने छत्तीसगढ़ीये को राज्य की बागडोर सौंप साथ मिलकर यहाँ की जनता और संसाधन लूट रहे हैं। इनलोगों ने झारखंडियों पर ऐसी स्थानीय नीति थोपी है जिससे यहां के मूलवासी हाशिए पर धकेले दिए गए हैं। और  उपचुनाव में विपक्ष की गोलबंदी को आने वाले 2019 के आम चुनाव के लिए भी शुभसंकेत बता रहे हैं।

vipaksh
झारखण्ड के समस्त विपक्ष

इसलिए झारखण्ड में जनता के भावनाओं पर चिंतन करते हुए हेमंत सोरेन के साथ-साथ तमाम विपक्षी दलों को तर्क के आधार पर सोचाना चाहिए और अपने सही वर्ग हितों की पहचान करनी चाहिए। बेरोज़गारी, बढ़ती महँगाई, सबके लिए शिक्षा और चिकित्सा सुविधा, पूँजीवादी लूट का ख़ात्मा, दमन-शोषण का ख़ात्मा आदि वे मुद्दे होंगे जिनके आधार पर व्यापक जनता को एकजुट किया जा सकता है। यही नहीं इन्हीं माँगों के आधार पर ही अन्य जातियों के ग़रीबों के साथ पुश्तैनी तौर पर खेती-किसानी से जुड़ी जातियों के बहुसंख्यकों की एकजुटता भी बनेगी। जायज़ माँगों के लिए एकजुट हो संघर्ष की प्रक्रिया में ही आपसी भाईचारा और एकता और भी मज़बूत होंगे। इस बात को जितना जल्दी समझ लिया जाये, उतना ही न केवल समाज के लिए बेहतर होगा, बल्कि 2019 में होने वाले चुनाव के लिए भी प्रभावी होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Related Posts

Click to listen highlighted text!