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सूचना क्रांति के युग में भी भारत पिछड़ रहा

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सूचना क्रांति के इस युग में भी भारत पिछड़ रहा है। आर्थिक अवनति में देश पिछड़ रहा है। धर्म-भक्ति में मां भारती को डूबोया जा रहा है। महँगाई सुरसा के मुंह से बड़ी हो चुकी है। बेरोज़गारों की श्रृँखला एशिया महादेश कर सकती है। गरीबी ने सुदामा कथा तक को भुला दिया है। 

एक-एक कर पड़ोसी देश दुश्मन हो रहे हैं। नेपाल, बांग्लादेश, थाईलैंड, मंयमार जैसे विश्वसनीय पड़ोसी मित्र हमारे दुश्मन बनते जा रहे हैं। हमारी विदेश नीति पूरी तह से डूब चुकी है। भारतीय संवैधानिक संस्थाएं इतनी डरी सहमी है कि अपने कर्तव्य एवं ज़िम्मेदारी को भी निभा पाने में पिछड़ चुकी है। 

न्यायालय खुद न्याय के लिए गुहार लगा रहा है। बह इतना डरा हुआ है कि एक अदना सा आदमी को अवमानना लिए सजा तक नहीं दे पाता है। मसलन, न्यायालय इयन पिछड़ चूका है कि वह जनता के अपील और आग्रह पर भी अदना सा ईवीएम मशीन को हटाने की मांग पूरा नहीं कर पाता है। 

टी एन सेशन का कमाया हुआ सम्मान को भी अब निर्वाचन आयोग खो चुका हूं। लोकतंत्र में जनता को सर्वोपरि बनाने का काम उसका है, लेकिन आज वह अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में भी असमर्थ है। एक-एक कर तमाम सार्वजनिक संस्थाओं को निजी हाथों में बेचे जा से सरकारी नौकरियाँ ख़त्म हो रही है।

लोकतंत्र में विपक्ष का सूरज कब का डूब चुका है, इसलिए भी भारत पिछड़ रहा है

चूँकि लोकतंत्र में विपक्ष का सूरज कब का डूब चुका है। इसलिए भी भारत पिछड़ रहा है। लोकतंत्र के चारों पहिये उखाड़ फेंके गए हैं। कहावत है “डूबते जहाज़ को पंछी भी छोड़ देता है”। लेकिन बड़ा सवाल है कि डूबते हुआ भारत को 125 करोड़ जनता कैसे छोड़े। हां विजय माल्या, मेहुल चौकसी और नीरव मोदी जैसे 10% अमीर लोग, जो भारत को डुबाने के लिए जिम्मेदार हैं। वह डूबते भारत को छोड़कर कब का अलग ठिकाना तलाश चुके हैं। आम जनता क्या करे?

आम जनता ने जिस भरोसे के साथ एक बेहतर और जिम्मेदार सरकार चुनी, जिसे लगा था कि वह सरकार देश को आगे ले जाएगा। उसी ने लोकतंत्र के पर को एक-एक कर क़तर कर भारत की उड़ान रोक दी। भ्रष्टाचार के दलदल में भारत को आकंठ तक डुबो दिया। केवल जरखरीद मीडिया यह सच्चाई दिखाई नहीं देता है। वह इस भ्रष्ट सरकार के वास्तविकता को मकड़जाल बुन छूपा रही है। और सोशल मीडिया फर्ज निभा कर कमाल दिखा रही है। ।।विद्रोही।।

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