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जीएसटी, नोटबंदी के बाद कोरोना ने तोड़ी देश की कमर, भाजपा कहती रही सब ठीक है

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रांची। देश की जनता ने मोदी के ढपोरशंखी वादों पर विश्वास करते हुए, भाजपा को 2014 और 2019 के संसदीय चुनाव में ऐतिहासिक जनादेश दिए। संसद के दहलीज को नमन करते हुए मोदी ने देश से फिर वादा किया कि भाजपा भारत में विकास की नई इबारत लिखेगी। देश को धोखे में रख कर यही से मोदी सत्ता द्वारा देश के कई जन कल्याणकारी नीतियों में क्रमबद्ध तौर पर परिवर्तन की शुरुआत हुई। और भाजपा व उसके अनुषागी दल इसे देशहित में बताते रहे।

लेकिन, धीरे-धीरे इन बदलावों ने न केवल देश को आर्थिक संकट में धकेला बल्कि संविधान के ढ़ांचे पर भी गंभीर चोट पहुंचाया। भाजपा की पूजिपतिप्रस्त नीतियां केंद्र को राज्य सरकारों से सहमती लेने की इजाज़त नहीं दिए, इसलिए मोदी सत्ता देश के सहकारी संघवाद को चोट पहुंचने से भी नहीं चुके। हर फैसला मोदी राज्यों को दरकिनार कर करती रही। नोटबंदी, जीएसटी जैसी नीतियाँ इसके स्पष्ट उदाहरण हो सकते हैं। 

2020 के दूसरे माह में कोरोना महामारी ने देश में दस्तक दी। इससे लड़ने के बजाय केन्द्रीय सत्ता द्वारा कोरोना महामारी का उपयोग अपनी राजनीति साधने में की गयी। नतीजतन देश में आयी आर्थिक संकट के आड़ में तानाशाह तरीके से पूंजिपतिप्रस्त नीतियों को जनता पर लादे जाने लगे। मोदी सत्ता अपने कारनामे को एक्ट ऑफ़ गॉड का नाम दे एक-एक कर देश के सारे उपक्रम व संस्थानों को निजी हाथों में सौपने की तैयारी कर ली।

देश में मादी सत्ता के गलत नीतियों के परिणाम का आलम यह है कि वित्तीय वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही (अप्रैल से जून) के बीच देश के विकास दर में 23.9 फ़ीसद की ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई। यह सब हो जाने के बावजूद भाजपा यह कहती रही कि देश में सब कुछ ठीक चल रहा है। और विपक्ष देश की जनता को बरगला रहा है।

नोटबंदी ने देश की विकास दर को गर्त में पहुंचाया 

8 नवम्बर 2016 का मनहूस व काला दिन, प्रधानमंत्री मोदी ने देश में नोटबंदी लागू किया। नोटबंदी से होने वाले फ़ायदों में भाजपा ने काले धन से लेकर चरमपंथ और आतंकवाद, जाली नोट पर अकुंश लगाने की बात को शामिल किया था। लेकिन न केवल सारे वादें पूरी तरह से फेल साबित हुए। नोटबंदी से देश की आर्थिक विकास दर की गति पर असर पड़ा।

2015-2016 के दौरान जीडीपी की ग्रोथ रेट 8.01 फ़ीसदी के आसपास थी, जो 2016-2017 के दौरान घट कर 7.11 फ़ीसदी रह गई। इसके बाद जीडीपी की ग्रोथ रेट 6.1 फ़ीसदी पर आ गई। वित्तीय वर्ष 2019-20 के जनवरी-मार्च तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था में 3.1 फ़ीसद की वृद्धि देखी गई थी जो आठ साल में सबसे कम थी। उसके बाद वित्तीय वर्ष 2020-21 के पहली तिमाही पर दर रिकॉर्ड स्तर पर कम हो गयी। 

जीएसटी का एक नकारात्मक परिणाम सहकारी संघवाद पर भी दिखा

भाजपा ने देश को बताया था कि जीएसटी आने के बाद बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में गिरावट आएगी। पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था एक अप्रत्यक्ष कर कानून के दायरे में आने से संगठित दिखेगी। कारोबार करना आसान होगा और देश में टैक्स की चोरी पूरी तरीके से रुक जाएगी। लेकिन, हुआ ठीक उलट। शुरुआती दौर के खामियों को देखते हुए भी सरकार यह मानने से इनकार किया कि जीएसटी का उद्देश्य सिरे से खारिज हो रहा है। 

एक रिपोर्ट के मुताबिक जीएसटी लागू होने से पहले अप्रत्यक्ष कर संग्रह की वृद्धि दर 21.33 फीसदी थी। लेकिन, जीएसटी लागू होने के बाद 2017-18 में घटकर 5.80 फीसदी ही रह गई। और दूसरी तरफ राज्य सरकारें केंद्र पर मोताज हो गयी। केंद्र जीएसटी का अदाएगी करने में आना कानी करने लगी। CAG के रिपोर्ट में यह सत्य भी सामने आया है कि केंद्र की मोदी सत्ता ने क़ानून उलंघन कर फण्ड का मन मुताबिक उपयोग किया। राज्यों के हक मारते हुए केंद्र ने सहकारी संघवाद पर चोट किया। 

मोदी सत्ता ने सेस फंड के नियम से परे जा कर गलत उपयोग किया – अब भरपाई करने के जगह राज्यों को उधार लेने की सलाह दे रही है 

जीएसटी के मद में मुआवज़े में आयी कमी की भरपाई को लेकर केंद्र और राज्यों की सरकारें विवादों में उलझ गयी है। राज्यों को केंद्र द्वारा जीएसटी लागू करते वक़्त आश्वासन दिया गया था कि पहले 5 वर्षों में अगर राजस्व में कमी आई तो वह पूरी भरपाई करेगा। केंद्र द्वारा जीएसटी में कई करों का विलय किये जाने के कारण ऐसा कहा गया था। यह वैसे कर थे जिसे पहले राज्य वसूलते थे।

लेकिन अपने गलत कारनामे के कारण केंद्र अपने वादे को निभा नहीं पायी और कमी की भरपाई न कर सकी। उपर से कोरोना की मार ने राज्य सरकारों की कमर ही तोड़ दी है। झारखंड जैसे गरीब  राज्य का 2500 करोड़ रूपये केंद्र के पास होना इसका स्पष्ट उदाहरण हो सकता है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा इसकी मांग कई बार की जा चुकी है। और अब केंद्र राज्यों से सलाह दे रहा है कि वह इस भरपाई के लिए उधार ले। जाहिर है इस सम्बन्ध में ज़्यादातर राज्यों खासकर गैर-बीजेपी शासित का विरोध करना जायज है। 

कोरोना ने देश के अर्थव्यवस्था पर आख़िरी किल ठोकी इसकी मार का असर झारखंड सहित 5 गैर-बीजेपी शासित राज्यों पर

कोरोना संकट के कारण हुए देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान देश की करीब 80 प्रतिशत आबादी की आमदनी में भरी गिरावट आयी है। एक लाभी सूचि ऐसी भी है, जिनकी आर्थिक आय के स्त्रोत पूरी तरह समाप्त हो गये। सेंटर फॉर इंडियन इकोनॉमी (सीएमआई) के किये 27 राज्यों में एक सर्वे में यह बात सामने आयी है। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजी-रोजगार पर सबसे बुरा असर पड़ा है। साथ ही जीएसटी के नकारात्मक परिणाम सहकारी संघवाद पर पड़ने से राज्य सरकारों अर्थवयवस्था संभालने में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। सीएमआईई और दूसरी संस्थाओं के आंकड़ों के मुताबिक, 25 मार्च को लॉकडाउन के ऐलान होने के बाद एक महीने में तकरीबन 10 करोड़ भारतीयों की नौकरी चली गयी है।

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