आंदाेलनकारियों के भविष्य के झारखंड का मॉडल है हेमंत सरकार की शासन व्यवस्था

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भविष्य के झारखंड का मॉडल

आंदाेलनकारियों के भविष्य के झारखंड का मॉडल साकार होने के सच्चाई के घबराहट में महाजनी प्रथा के वर्तमान धड़ा ने हेमंत रूपी झारखंडी विचारधारा पर हमला किया है   

मौजूदा हेमंत सरकार द्वारा राज्य में बढ़ाए जा रहे सधे कदम, झारखंड के महापुरुषों के सपनों के झारखंड की तरफ़ है। वही सपने जिसके आधार पर झारखंड के महान आंदोलकारियों द्वारा अलग झारखंड की मांग का बुनियाद रखी गयी थी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का राज्य की गरीब जनता के प्रति संवेदनशीलता दर्शाता है कि उनके खून में राज्य के आन्दोलनकारियों के सपनों का समावेश है। और यही झारखंडियत भावना राज्य में 14 वर्ष तक शासन करने वाली भाजपा को डरा रही है। 

राज्य में हेमंत सरकार द्वारा बनाए जाने वाली खेल नीति की बात हो, कोरोना जैसे भीषण संकट में प्रवासियों का अपने राज्य वापस लाना हो,  बिरसा हरित ग्राम योजना हो, नीलाम्बर-पीताम्बर जल समृद्धि योजना हो, पोटो हो खेल विकास योजना हो, मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना हो, बेरोजगारी भत्ता ऑनलाइन पोर्टल हो, झारखंड आजीविका संवर्धन हुनर अभियान हो, पलाश ब्रांड का भूमंडलीकरण हो, सभी योजनाओं में गरीब जनता के प्रति समर्पण व महापुरुषों के सपनों की स्पष्ट झलक दिखती है। यकीनन इतने बड़े अभियान में जुटी सरकार को 14 वर्षों के कालिख को मिटाने में वक़्त लगेगा, युवाओं को इस नाजुक मौके पर धुंध के पार देखते हुए सच को समझना पड़ेगा।

आंदाेलनकारियों के पास भविष्य के झारखंड का मॉडल तैयार था

अलग झारखंड के आंदाेलनकारियों के पास भविष्य के झारखंड का एक मॉडल तैयार था। चाहे वे जयपाल सिंह हाें, एनई हाेराे हाें, विनाेद बिहारी महताे, एके राय या दिशुम गुरु शिबू साेरेन हाें, उन्हें अपने राज्य की हर छाेटी-बड़ी चीजाें की जानकारी थी। समय-समय पर आंदाेलनकारियाें की ओर से जब भी कहीं आयाेग-सरकार काे काेई ज्ञापन साैंपा गया, बारीकियाें से शासन व्यवस्था, संसाधन और उसके उपयोग की जानकारियां उस ज्ञापन शामिल किया गया।  

युवाओं को अलग झारखंड के लिए 1954 में दिए गए ज्ञापन पर जरुर नजर डालना चाहिए

इस सच्चाई को समझने के लिए झारखंडी जनमानस व राज्य के भविष्य, युवाओं को राज्य पुनर्गठन आयाेग काे 1954 में दिए गए ज्ञापन पर जरुर नजर डालना चाहिए। इस ज्ञापन के परिशिष्ट बी में इस बात का उल्लेख है कि कैसे झारखंड में (यहां जंगल है) लकड़ी और फर्नीचर उद्याेग, माचिस डिबिया उद्याेग, कागज उद्याेग, बांस आधारित उद्याेग, बीड़ी उद्याेग, महुआ उद्याेग, लाह उद्याेग, जड़ी बूटी उद्याेग, शहद उद्याेग, खैर उद्याेग, किसानी व मुर्गी-मछली पालन उद्याेग, काे बढ़ावा देकर यहां की अर्थ व्यवस्था मजबूत की जा सकती है। इसी सच्चाई का स्पष्ट दर्शन है हेमंत सरकार की योजनायें। 

इसमें न सिर्फ झारखंड अलग राज्य की मांग की गयी थी बल्कि राज्य कैसे चलेगा, इसका विस्तृत ब्याेरा भी अंकित था। बाकायदा 1978 में शालपत्र द्वारा आयाेजित झारखंड क्षेत्रीय बुद्धिजीवी सम्मेलन इस पर विस्तार से चर्चा भी हुई थी। एनई हाेराे, विनाेद बिहारी महताे, शिबू साेरेन ने उस सम्मेलन में झारखंड के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए अपने विचार भी दिए थे, जिस पर आम सहमती भी बनी थी। चाहे राज्य चलाना हाे, यहां की भाषा-संस्कृति का मामला हाे या झारखंड के विकास का आर्थिक मॉडल हाे, सम्मेलन में सभी पर चर्चा हुई थी, पेपर बना था, ये आज भी धराेहर के रूप में मौजूद हैं।

दुर्भाग्य है कि झारखंड के अलग होने के बाद, राज्य की सत्ता पर महाजनी प्रथा का अलग धड़ा काबिज हो गया

झारखंड का दुर्भाग्य है कि झारखंड के अलग होने के बाद, राज्य की सत्ता पर महाजनी प्रथा का अलग धड़ा काबिज हुए और उन असंख्य क्रांतिकारियों के सपने पूरे न हो सके। मौजूदा दौर में झारखंड की जनता ने महाजनी प्रथा के वर्तमान अनुयायियों की मंशे को समझा और राज्य के सत्ता पर झारखंडी क्रांतिकारियों के खून, हेमंत सोरेन को बिठाया। अभी तो उन्होंने महाजनी प्रथा के वर्त्तमान प्रारूप के उलझे सिरे को सुलझाने के तरफ कदम बढ़ाया ही हैं कि लूटेरों की पूरी व्यवस्था डगमगाने लगी है। राज्य के मुख्यमंत्री पर 4 जनवरी 2021 को हुआ हमला उसके खौफ को जाहिरा तौर पर खुलासा करती है। 

यह हमला हेमंत सोरेन को ख़त्म करना नहीं बल्कि हेमंत सोरेन रूपी विचारधारा को ख़त्म करने के लिए हुई है 

मसलन, इस हमले का मकसद व्यक्तिगत रूप हेमंत सोरेन को ख़त्म करना नहीं है, बल्कि लूटेरी संस्कृति के सामने दीवार बन खड़ी, हेमंत सोरेन रूपी विचारधारा को ख़त्म करने की है। यह राज्य के युवाओं के उज्जवल भविष्य को अंधकार के भंवर में फिर उतारने के लिए लूटरों की जुगत है। राज्य को समृद्ध बानाने वाली समझ को ख़त्म करने के लिए साजिशन हुआ यह हमला है।

बहरहाल, राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस मुद्दे को पिछली सरकार की तरह आक्रामकता से नहीं बल्कि सुलझे समझ के साथ हल निकालने के तरफ बढ़ी है। निश्चित रूप से यही तरीका किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था का होना चाहिए। हमले की गंभीरता को देखते हुए पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए सरकार ने दो सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है। इस समिति में भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा के एक-एक वरीय अधिकारी शामिल किए गए हैं। समिति को मुख्यमंत्री के काफ़िले पर हुए हमले की पूरी जांच कर विस्तृत प्रतिवेदन समर्पित करेगी। और रांची उपायुक्त व वरीय पुलिस अधीक्षक से शो कॉज की मांग की गई है। 

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