भाजपा ने जहां झारखंडी बच्चों की शिक्षा छिनी, वहीं हेमंत शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के साथ इसे रोजगारन्मुखी बनाने की रखते हैं चाह

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सौगात

रांची। अपने पिछले पांच साल (Dec 2014- Dec 2019) के दौरान भाजपा सरकार के जिस कार्यशैली की किरकरी हुई थी, वह राज्य की शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी है। दरअसल भाजपा सरकार के समय राज्य की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह बर्बाद होने की स्थिति में पहुंच गयी थी। राज्य में सत्ता से हटने के बाद भाजपा के इस काम का जिम्मा अब केंद्र सरकार ने संभाल लिया है। बीते दिनों राज्य के कुछ मेडिकल कॉलेजों की स्थिति को लेकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का आरोप इसी बात का संकेत करता हैं। हालांकि हेमंत सोरेन ने सत्ता में आते ही इस व्यवस्था को सुधारने की कोशिश भी शुरू की। उन्होंने न केवल शिक्षा व्यवस्था को दुरस्त करने का जिम्मा उठाय़ा. बल्कि शिक्षा को रोजगारन्मुखी बनाने के साथ बेरोजगार शिक्षित युवक-युवतियों के लिए रोजगार पर भी फोकस किया।  

रघुवर ने लगाया था आरोप, स्थानीय युवा नौकरी करें यह हेमंत सरकार नहीं चाहती।

बीते दिनों नियोजन नीति को लेकर हाईकोर्ट के फैसले के बाद पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया था कि हेमंत सरकार नहीं चाहती कि राज्य के स्थानीय युवाओँ को नौकरी मिले। उनकी सरकार ने आदिवासी-मूलवासी के लिए नियोजन नीति बनाकर स्थानीय युवाओं को नौकरी में प्राथमिकता दी थी। लेकिन यह बताना रघुवर दास भूल गये कि इससे राज्य में सामाजिक अलगाव को बढ़ावा मिला। अलगाव भी इतना कि हाईकोर्ट के निर्देश के बाद काम कर रहे हजारों युवाओं में परेशानी झलक उठी। मीडिया को बयान देते वक्त रघुवर दास यह भूल गये कि उनके नेतरहाट कैबिनेट में लिये एक निर्णय से जहां हजारों जेपीएससी छात्र बर्बाद हो गये। वहीं जेएसएससी अंतर्गत एक परीक्षा को भी उन्हें सही ढ़ग से नहीं पूरा किया। इसमें सचिवालय सहायक परीक्षा तो सबसे ज्यादा चर्चा में रही। 

मेडिकल कॉलेजों की मान्यता खत्म करने का आरोप

वैसे तो मुख्यमंत्री ने पूरे कोरोना काल में केंद्र पर झारखंड के साथ दोहरी नीति अपनाने की बात की। लेकिन अब उन्होंने मेडिकल कॉलेजों की मान्यता खत्म करने का भी आरोप केंद्र पर लगा दिया। हेमंत ने आरोप लगाया कि केंद्र की भाजपा सरकार एनएमसी के माध्यम से पलामू, दुमका और हजारीबाग मेडिकल कॉलेजों की मान्यता समाप्त करने पर तुली है। सीएम ने सवाल उठाया है कि झारखंड स्थित एम्स का अभी बना भी नहीं है, लेकिन उसे मान्यता कैसे मिली हुई है?  इसका क्या अर्थ है?

शिक्षा को दुरुस्त करने के लिए मुख्यमंत्री की मुख्य पहलें.

• हेमंत सरकार शिक्षा को दुरुस्त करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही हैं। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग ने हाई और प्लस-2 स्कूलों में पढ़ने वाले 9वीं से 12वीं छात्र-छात्राओं को एप के जरिए डिजिटल कंटेट उपलब्ध कराने की बात की। इसके लिए विभाग जल्द ही लर्नेटिक्स नाम से एप लॉच करेगा। 

• हेमंत सोरेन ने पिछली सरकार में ग्रामीण इलाकों में बंद किये स्कूलों को फिर से खोलने के लिए एक नयी पहल की। उन्होंने स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) के मौके पर 5000 विद्यालयों को शिक्षक-छात्र अनुपात, प्रशिक्षक सहित खेल मैदान, पुस्तकालय आदि सभी सुविधाओं से युक्त करते हुए सोबरन मांझी आदर्श विद्यालय के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया।  

• 12 सितंबर को उच्च, तकनीकी शिक्षा एवं कौशल विकास विभाग के नीतिगत विषयों की समीक्षा में उन्होंने उच्च शिक्षा में गुणात्मक सुधार तथा क्वालिटी एजुकेशन देने को प्राथमिकता बतायी। उन्होंने निर्देश दिया कि राज्य के अधिकांस विश्वविद्यालयों में स्वीकृति कुल 3732 पदों में रिक्त 2030 पद और 4181 अतिरिक्त पद को भरने के लिए विभाग कदम उठाये। इसी तरह बीआईटी सिंदरी को तकनीकी संस्थान और नवनिर्मित इंजीनियरिंग महाविद्यालयों और पॉलीटेक्निक संस्थानों को मल्टी डिसीप्लनरी संस्थान के रुप में विकसित करने की बात सीएम ने की। 

• फरवरी 2021 में मैट्रिक और इंटरमीडिएट की प्रस्तावित परीक्षा के ठीक पहले हेमंत सरकार द्वारा संशोधित सिलेबस जारी होने की बात भी सामने आयी। हालांकि शिक्षा मंत्री के आश्वस्त होने के कारण मामला अभी लंबित है। लेकिन सिलेबस में कटौती के प्रयासों से ऐसे बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल सकेगी।

• दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था को देख मुख्यमंत्री ने पहले ही यह घोषणा कर दी थी कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था को वे दिल्ली से भी बेहतर बनाएंगे। पिछले साल के बजट के मुकाबले शिक्षा में करीब 2 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी उनके इस लक्ष्य को साधने की दिशा में उठाया गया पहला कदम माना गया।

• झारखंडी बच्चों के हित में मुख्यमंत्री ने मोदी सरकार की ‘नयी शिक्षा नीति’  को गलत बताने में परहेज नहीं की। उन्होंने कहा कि ऐसी नीति देश में निजीकरण और व्यापार को बढ़ावा देगी। हेमंत ने नीति में निजी और विदेशी संस्थानों को आमंत्रित करने की बात पर नाराजगी जतायी। वहीं आदिवासी, दलित, पिछड़े, किसान-मजदूर वर्ग के बच्चों के हितों की रक्षा के बारे में नीति में कुछ ठोस नहीं होने की बात की। उन्होंने सवाल उठाय़ा था कि क्या 70-80 प्रतिशत के बीच की जनसंख्या वाले इस बड़े वर्ग के बच्चे लाखों-करोड़ों की फीस दे पायेंगे?

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