संसाधन लूट से पैदा हुए प्रदूषण से मरती आम ग़रीब जनता

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संसाधन लूट से पैदा हुए प्रदूषण

झारखंड में संसाधन लूट से पैदा हुए प्रदूषण ने घटाई आम जनता की उम्र  

देश को पहले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन की साल 2016 की रिपोर्ट ने यह खुलासा कर हिला दिया था कि भारत में अकेले प्रदूषण और ज़हरीली हवा की वजह से एक लाख बच्चों की मौत हुई, जबकि दुनिया में छह लाख बच्चे मौत के मुँह समा गये। लगता है इस सहमा देने वाली रिपोर्ट ने भी झारखंड सरकार को जगा नहीं पाई। न हाथी उड़ा और न ही प्रदेश को बिजली मिली, मिली तो केवल यहाँ की जनता को व्यापक मात्र में बढ़ी हुई प्रदूषण व ज़हरीली हवा। जी हाँ यही सच्चाई है झारखंड की… 

अब जो खबर सामने आ रही है वह झारखंडी जनता का होश उड़ाने वाली है, इसका तस्दीक खुद दिल्ली में जारी एक रिपोर्ट कर रही है। अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय की शोध संस्था ‘एपिक (एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट एट द यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो) ने सैटेलाइट से प्राप्त तस्वीरों की मदद से,  वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक (एक्यूएलआई) के मानक स्तर पर रिपोर्ट जारी हुई है, कि झारखंड में प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ चुका है कि वहां के लोगों की उम्र उनके औसतन उम्र से साढ़े चार साल घट गया है।

इस सूची का दायरा तो पूरा झारखंड है, लेकिन गंभीरतम स्थिति के जद में राँची, पलामू, गोड्डा, कोडरमा, साहिबगंज, बोकारो, गिरिडीह व धनबाद जैसे शहर हैं, जहाँ के लोगों की उम्र करीब पांच वर्ष कम हुई है। इन आंकड़ों के बीच सरकार के तंत्र दावा करती है कि प्रदूषण को नियंत्रित करने  के लिए हर संभव उपाय हो रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि झारखंड के जनता को मयस्सर आबोहवा में ज़हर संसाधन लूट कर घोला गया, जगजाहिर है, माँ लीजिये। 

मसलन, जबतक इस प्रदेश के सरकार के लिए उत्पादन का उद्देश्य जनता की ज़रूरत के बजाय मुनाफ़ा व लूट होगा, जबतक यहाँ के लोगों के हाथ में उत्पादन के का नियंत्रण नहीं होगा, तब तक इसी प्रकार संसाधन लूट से पैदा होने वाली प्रदूषण से लोगों के जीवन खतरे में रहेंगे।

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