आदिवासी मुख्यमंत्री के झारखण्ड में मायने

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आदिवासी मुख्यमंत्री की जरूरत

झारखण्ड में आदिवासी मुख्यमंत्री की जरूरत आखिर क्यों है?

भारतीय समाज में जाति का सवाल सबसे ज्‍वलंत सवालों में से एक है। जनता को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटने का ये एक ऐसा तरीका है जो यहां आने वाले हर शासक को भाया है। चाहे वो मुगल हों या अन्‍य मध्‍यकालीन शासक या फिर अंग्रेज, सबने जाति का इस्‍तेमाल यहां की जनता को बांटकर रखने के लिए किया। भारत के वर्तमान शासक भी अपवाद नहीं है। इसलिए भारत में दबे कुचले वर्ग को एकजुट करने के लिए व क्रांतिकारी परिवर्तन परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए जाति उन्‍मूलन के कार्यभार को ठीक से समझना होगा।

आज मौजूद जाति व्यवस्था के उन्मूलन के लिए उसकी उत्पत्ति, भारतीय इतिहास में बदलते उत्पादन सम्बन्धों के साथ जाति व्यवस्था का स्वरूप तथा दलित-आदिवासी-मूलवासी मुक्ति संघर्षाें के योगदान व सीमाओं का विश्लेषण करना जरूरी है। झारखण्ड के अलावा पूरे देश के स्तर पर दलित-आदिवासी आबादी पर बढ़ती उत्पीडन की घटनाओं से लेकर मेहनतकश दलित-आदिवासी-मूलवासी आबादी की सामाजिक, आर्थिक स्थिति के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। ज्योतिबा फुल, पेरियार से लेकर डाॅ अम्बेडकर के जाति-विरोधी संघर्ष इसका उदाहरण हैं। इसलिए आज देश में केवल सवर्ण सरकार के भरोसे रहने, रियायतें माँगने और सुधारवाद के भरोसे इस बड़ी आबादी का उत्थान संभव नहीं है।

ग़ौरतलब है, आर्थिक शोषण और सामाजिक उत्पीड़न के सम्मिश्रित रूपों को चालाकी से बनाये रखने का कार्य स्वर्ण-शासक वर्ग और उसकी राजनीतिक सत्ता करती हैं। इसलिए राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक क्रान्ति को अलग-अलग करके देखना अवैज्ञानिक है। इसलिए आंबेडकर ने कहा था कि  जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी भागीदारी का रास्ता ही वास्तव में क्रान्ति का रास्ता है, जो आर्थिक शोषण के साथ-साथ सामाजिक उत्पीड़न के तमाम रूपों के विरुद्ध कारगर तौर पर संघर्ष को संभव बनाता है। इसलिए यह आसानी से समझा जा सकता है कि झारखण्ड में दलीत-आदिवासी-मूलवासी-अल्प्संखयक बाहुल्य आबादी वाले राज्य के लिए आदिवासी मुख्यमंत्री का होना न केवल उच्चित बल्कि बेजुबानों की जरूरत भी है 

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