स्त्रियों के अधिकार की लड़ाई झारखंड में हमेशा झामुमो ने लड़ी है

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स्त्रियों के अधिकार

झारखंड की स्त्रियों की मुक्ति का रास्ता आखिर क्या होगा यह सोचने का मुद्दा है? मौजूदा शासनकाल में शोषण, उत्पीड़न और पितृसत्ता के दमन के विभिन्न रूपों का शिकार सबसे अधिक झारखंड के ही  स्त्रियों को होना पड़ता है। इतिहास बताता है कि इस राज्य की स्त्रियों ने अलग झारखंड के लिए संघर्षों के कई कीर्तिमान स्थापित किये। राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में उनकी हिस्सेदारी पुरुषों से पीछे नहीं रही। लेकिन आज राज्य के प्रमुख समाचार पत्र के प्रथम पृष्ठ इनकी स्थिति बयान करती रहती है। मानो जैसे मौजूदा सत्ता इन्हें मलकुण्ड में समेट देना चाहती है। 

लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था, हेमंत सोरेन के शासनकाल में उन्होंने महिलाओं के लिए हर मुमकिन प्रयास किये -जैसे समान काम के लिए समान मेहनताना, समान सामाजिक-राजनीतिक अधिकार, काम करने की सुविधाजनक और सम्मान जनक स्थितियाँ स्त्रियों की आर्थिक गतिविधियों में समान भागीदारी और घर के दायरे से बाहर निकलना, विवाह और तलाक के सम्बन्ध में बराबर अधिकार, शराबखोरी का खात्मा कुछ मील के पत्थर थे। पिछड़े हुए झारखंडी समाज में अलग झारखंड बनने के बाद सामाजिक-राजनीतिक कार्रवाइयों, सामरिक मोर्चे और बौध्दिक गतिविधियों के दायरे में जितनी तेजी से औरतों की भागीदारी बढ़ी, वह रफ्तार न पहले और न ही अब तक देखी गयी। स्त्रियों की मुक्ति के नये क्षितिज सामने आये। 

श्री सोरेन के कार्यकाल में महिलाओं के अधिकार के अंतर्गत सरकारी नौकरियों में 50 फीसदी आरक्षण, विधवाओं व तलाकशुदा महिलाओं के लिए सरकारी नौकरियों में अलग से 5 फीसदी आरक्षण का प्रावधान, लड़कियों के लिए तमाम प्रकार के तकनीकी शिक्षा को मुफ्त कर दिया जाना, वृद्धापेंशन में 200 रूपए की बढ़ोतरी, ग़रीबों के बेटियों के विवाह के लिए 5 ग्राम सोना, अति गरीब महिलाओं को मात्र 10 रूपए में साड़ी मुहैया कराना आदि जैसे कदम उठाकर आज की तुलना में इनकी अवस्था को सुदृढ़ बनाने का प्रयास किये थे।

बहरहाल, जिस देश की ज्यादातर महिलाएँ दिन-रात खटकर किसी तरह अपने परिवार का पेट भरती है, जो घर के भीतर, चूल्हे-चौखट में ही अपनी तमाम उम्र बिता देने को अभिशप्त हैं, जो आये दिन अनगिनत किस्म के अपराध और बर्बरताओं का शिकार होती हैं, उस समाज के स्त्रियों के के भविष्य को सही दिशा देने का प्रयास करना पूरी मानवता का कद ही तो बड़ा करना है। इसलिए राज्य के महिलाओं के कहना है कि आज फिर उनकी स्थिति को फिर से पटरी पर लाने के लिए सत्ता परिवर्तन की लडाई लड़नी होगी। सत्य ही तो है क्या कोई भी जंग आधी आबादी की भागीदारी के बिना जीती जा सकती है?

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