राष्ट्रीय-दल अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करें

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राष्ट्रीय-दल

 

भारत एक प्रजातान्त्रिक देश है। प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में जनता द्वारा जनता के कल्याण के लिए एवं जनता द्वारा शासन किया जाता है। प्रजातान्त्रिक शासन प्रणाली में सभी नागरिकों को यह अधिकार होता है कि उनकी आवाज को सुना जाए चाहे वे किसी भी धर्म, जाति, लिंग या क्षेत्र के हों। विभिन्न मौकों पर यहाँ प्रचलित संघीय शासन प्रणाली के कारण क्षेत्रीय या वर्ग विशेष की समस्याएँ या तो उपेक्षित हो जाती हैं या उन पर कम ध्यान दिया जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की अपनी समस्याएँ होती हैं जिन पर राष्ट्रीय-दल या केन्द्रीय नेताओं का ध्यान नहीं जाता दूसरा केन्द्र अपनी शक्तियों का प्रयोग मनमाने ढंग से करता रहा है। ऐसी परिस्थिति में उन क्षेत्रीय समस्याओं या मुद्दों को आवाज देने और उन पर राष्ट्र का ध्यान आकर्षित करने के लिए क्षेत्रीय दलों का उदय होता है। एक राष्ट्रीय-दल कभी भी संख्या के हिसाब से छोटे समूह की समस्या का आवाज नहीं बन पाता है, ऐसी परिस्थिति में उपेक्षितों की आवाज बुलंद करने वाले क्षेत्रीय दलों की भूमिका बढ़ जाती है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के भारत में अनेकों लोक हितकारी फैसले लिए गए हैं जो क्षेत्रीय दलों के सक्रीय प्रयास के कारण हो सका, जिसे भाजपा एवं कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय-दल कभी भी होने नहीं देतेअकाली दल, शिवसेना, टी आर एस, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा आदि जैसे क्षेत्रीय दल न होते तो क्रमशः पंजाब, महारष्ट्र, तेलांगना एवं झारखण्ड राज्य अपने वर्तमान स्वरुप में न होतेछुआ-छुत, जात-पात के खिलाफ अगर बहुजन समाज पार्टी, द्रविड़ मुन्नेत्र कडगम, अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कडगम की सक्रीयता को कौन भूल सकता हैयह कैसे भुला जा सकता है कि कांग्रेस पार्टी ने अनेकों बार उत्तरी बिहार के नेताओं के प्रभाव में आकर अलग झारखण्ड के आन्दोलन को कुचलने का प्रयास किया, लगभग 35 साल तक झारखण्ड निर्माण को बाधित कियाजयपाल सिंह मुंडा को छलने की बात हो या शिबू सोरेन को तमाड़ में हरवाने का कार्य कांग्रेस ने हमेशा झारखंडी स्थानीय नेताओं के उभार की संभावना को कुंद कियाके. सी. आर. की भूखे-प्यासे अनशन पर बैठी तस्वीर या आत्मदाह का प्रयास कर रहे युवक की तस्वीर और कांग्रेस आलाकमान की बेरुखी भरे बयान आज भी तेलंगाना के लोगों के जेहन में जिन्दा हैलठैतों की पैरोकार रही कांग्रेस-भाजपा कभी भी बहुजनों की आवाज को मजबूत न कर पायीइन दोनों राष्ट्रीय दलों ने समय-समय पर केन्द्रीय एजेंसियों का भय दिखाकर मायावती जी को कमजोर किया

अंततः भूत जो भी रहा हो, भाजपा-कांग्रेस अपने को जितना भी मजबूत समझ बैठे हों पर वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जिस राज्य में क्षेत्रीय दल सक्रीय हैं वहाँ इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकतातेलंगाना में भाजपा-कांग्रेस को मिली हार क्षेत्रीय दलों के महत्व को रेखांकित कर गयी इन दलों की सफलता एवं असफलता से इनकी प्रासंगिकता में कोई कमी नहीं आई है । हालाँकि जब-जब राष्ट्रीय-दल मजबूत होते हैं ये क्षेत्रीय दलों पर अंकुश लगाने का प्रयास करते हैंकांग्रेस को पिछली गलतियों से सीख लेते हुए क्षेत्रीय आकांक्षाओं एवं क्षेत्रीय-वर्गीय हितों का ध्यान रखते हुए व्यापक नजरिया अपनाने की जरूरत है।

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