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क़ानून-व्यवस्था

भाजपा समर्थक के पिता के हत्यारे को क़ानून-व्यवस्था ताक पर रख किया गया रिहा

झारखंड राज्य की क़ानून-व्यवस्था की स्थिति को देख कर आसानी से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि संविधान से छन-रिसकर जो सीमित जनवादी  अधिकार प्राप्त होते हैं, उनका बड़ा हिस्सा क़ानून-व्यवस्था के मकड़जाल में अटक जाता है। बमुश्किल वहाँ से जो जनवादी अधिकार के कुछ क़तरे निकलते भी हैं तो दफ्तरों के अफसरों-बाबुओं और थानों के दारोग़ाओं की फाइलों और जेबों में अटके रह जाते हैं। लागू करने वाले तन्‍त्र ने क़ानून को औपनिवेशिक बना दिया है।

भारत की निचली अदालतों में तीन करोड़ से अधिक मुकदमे लम्बित पड़े हैं। देश की जेलों में 70 फीसदी से अधिक विचाराधीन कैदी हैं जिनमें से अधिकांश अपने ऊपर लगे अभियोग के तहत मिलने वाली अधिकतम सज़ा से अधिक समय जेलों में काट चुके हैं। इस तथ्य में दिलचस्प यह है कि उनमे से अधिकांश कैदी एससी/एसटी/ओबीसी या आम गरीब के श्रेणी से आते है। लेकिन यह सरकार जितनी दिलचस्पी धन्ना सेठों या अपराधियों को रिहा करने दिखा रही है उतना अधिकतम सज़ा काट चुके कैदियों पर क्यों नहीं दिखाती? साथ ही पुलिस थानों में व्याप्त भ्रष्‍टाचार की तो बात ही करना बैमानी है।

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अब क़ानून-व्यवस्था में भ्रष्टाचार का दीमक राज्य में किस स्तरों तक पैठ कर चुका है इसका ताजा उदाहरण झारखंड के गिरिडीह जिले में देखा जा सकता है। एसपी की रिपोर्ट और न्यायालय का आदेश को ताक पर रख गिरिडीह बरमसिया के कुख्यात अपराधी पवन तिवारी को जेल से रिहा कर दिया गया। इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले और कोई नहीं पूर्व जिला प्रोबेशन पदाधिकारी कमलजीत सिंह व केन्द्रीय कारा मेदिनीनगर पलामू काराधीक्षक हैं, विभागीय जांच ने इसकी पुष्टि हुई  है।

इस अपराधी के संबंध में स्थानीय एसपी ने अपने रिपोर्ट में लिखा था कि पवन तिवारी का संबंध कई अपराधिक संगठनों से है। बद्री प्रसाद नारायण का यह हत्यारा अपनी जीवित पत्नी को मरा बता प्रोविजनल बेल ले चुका है। यह अपराधी कारागार से छूटने पर पुनः अपराध कर सकता है। इस मामले का दूसरा दिलचस्प पहलु यह है कि मृतक बद्री प्रसाद नारायण के पुत्र (रिंकू) भाजपा समर्थक रहे हैं और एक वर्ष पूर्व इन्होंने गुहार लगाई थी कि इनके पिता के हत्यारे को बरी करने की योजना बनाई जा रही है फिर भी भाजपा सरकार के कानों पर जूं तक न रेंगी।

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