आपदा राहत पैकेज

रघुबर सरकार की आपदा राहत पैकेज का सच

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रघुबर सरकार ने आपदा राहत पैकेज के नाम पर अपनी योजनाओं के प्रति बरती गयी लापरवाही को छुपाने का एक शर्मनाक हथकंडा अपनाया है। बज्रपात, कम बारिश होने से जल संकट, सर्पदंश, खनन जनित आपदा, रेडिएशन से होने वाली मौत के साथ-साथ डोभा में डूबने से मौत को भी आपदा राहत पैकेज के अंतर्गत शामिल कर लिया है, ताकि झारखंडी जनता को अपने नाकामियों और लापरवाहियों से बेहद चालाकी से विमुख कर सके।

रघुबर सरकार ने जल संग्रह, सिंचाई की समस्या आदि का हवाला देते हुए राज्य के ग्रामीण इलाकों में डोभा निर्माण की योजना शुरू की थी। बहुत से ग्रामीण इलाकों में डोभे का निर्माण कर जोर-सोर से अपने किए गये फर्जी विकास का ढिंढोरा पीटने में व्यस्त हो गयी। परन्तु बहुत जल्द डोभा में डूबकर मौत की ख़बरों ने भाजपा सरकार की इस योजना की पोल खोलनी शुरू कर दी। डोभों के निर्माण में बरती गयी लापरवाही, निर्माण की गुणवत्ता सरकार की इस योजना पर सवालिया निशान खड़ी करती है।

ऐसे में सरकार की उन मासूमों के प्रति जवाबदेही होती है जिनको सरकार द्वारा सृजित इस आपदा का शिकार हो अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। बावजूद इसकी जाँच कराने के रघुबर सरकार ने जनता को अपने कृत्य से भ्रमित करने के लिए इसे विशिष्ट स्थानीय आपदा में शामिल कर आपदा राहत पैकेज के तहत  मुआवजा देने की घोषणा कर दी। लेकिन ऐसे में सवाल यह उठता है कि मुआवजे की राशि लोगों को मिलने से क्या ये मौत का सिलसिला थम जाएगा या इसका कोपभाजन बने मासूम वापस आ जाएँगे? बेशक ऐसा कुछ होने की गुंजाईश नहीं है लेकिन आपदा राहत पैकेज और मुआवजे के आड़ में सरकार के संरक्षण में हो रहे एक और घोटाले का पर्दाफाश जरूर हो जाएगा।

हालांकि यह पूरा प्रकरण झारखंड की निकम्मी सरकार का, जनता के प्रति झूठे विकास के ढकोसलों और उसके पीछे के काले सच का इकलौता उदहारण नहीं है, परन्तु इस बार तो रघुबर सरकार ने शर्म की सारी सीमायें पार कर दी।अपने कुकर्मों को छुपाने के लिए मासूमों के जान का सौदा करने तक से बाज नहीं आई और इस पर राहत पैकेज के नाम का चादर ओढाने की कोशिश कर रही है।

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