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अबतक वनक्षेत्र के 50,000 हेक्टेयर भूमि लूटा चुकी है यह सरकार

अबतक वनक्षेत्र के 50,000 हेक्टेयर भूमि लूटा चुकी है यह सरकार

किसी के चरित्र को संक्षेप में, सही-सटीक तरीके से समझने के लिए, ऊपरी टीमटाम और लप्पे-टप्पे को भेदकर उसके अन्दर की सच्चाई को जानने का सबसे उचित-सटीक तरीका यह होता है कि हम उस चीज के जन्म, विकास और आचरण की ऐतिहासिक प्रक्रिया की पड़ताल करें। साम्प्रदायिकता के ज़हर को दिमाग से हटाकर सोचा जाय तो इन सवालों का जवाब बहुत आसान है।

अब देखिये न, हम झारखंडी एक तरफ हिन्दू-मुसलमान में उलझे रहें और दूसरी तरफ हमारे जंगलों से लगभग 50 हजार हेक्टेयर भूमि को उड़ा लिया गया। और हमारे मुख्यमंत्री जो कि खुद वन मंत्री हैं, को इसका पता भी न चल सका। कैसे इस सेवक पर विश्वास किया जाय?

दरअसल, मुख्यमंत्री रघुवर दास के जिम्मे झारखण्ड का वन विभाग हैं। वन विभाग के सभी प्रमंडलों के जिलों में वन भूमि का अतिक्रमण हुआ है। इस पूरे प्रकरण को निःसंदेह वन घोटाले का नाम दिया जा सकता है क्योंकि यह अतिक्रमण थोडा-मोड़ा नहीं अपितु पूरे जंगली क्षेत्र के लगभग 50,000 हेक्टेयर है। हालांकि सीएमओ ने इसकी पूरी रिपोर्ट मांगी है परन्तु क्या होना है? क्या बिना साठ-गांठ के इतनी बड़े घोटाले को अंजाम दिया जा सकता है? जैसा इस सरकार ने और घोटालों के ऊपर मुँह फेरा है वैसा ही यह  यहाँ भी करेगी। फिर तो वही बात होगी कि इन लूटेरों को रघुवर दास के प्रशासन व्यवस्था से कोई भय नहीं।

प्राकृतिक प्रेमी एवं प्रदेश के समस्त अखबारों के प्रथम पृष्ठ में पेड़ लगाने के छवियों से छाये रहे रघुवर सरकार अब तक तो इस प्रदेश के वनों के घनत्व में एक इंच की वृद्धि तो दर्ज नहीं करा पाए, बल्कि खनन के अंतर्गत विभिन्न परियोजनाओं के नाम पर 7 हजार हेक्टेयर वन भूमि का अधिग्रहण जरूर कर कर लिए। जबकि निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा लगभग 14 हजार हेक्टेयर वन भूमि अधिग्रहण किया गया। आज के दौर में इन कुल ज़मीनों की कीमत लगभग 13 अरब या इससे अधिक आंकी गयी है।

सारंडा, कोल्हान और पोड़ैयाहाट के जंगल क्षेत्र में माइनिंग कंपनियों को ड्राफ्ट तैयार करने के लिए निर्देश के साथ-साथ कमिटी गठित भी की गयी थी। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट के अनुसार पाया कि सारंडा, कोल्हान और पोड़ैयाहाट एशिया के बेहतरीन जंगलों में से एक है। यहाँ के जंगलों में जानवरों के अलावा विभिन्न प्रजाति के पेड़-पौधे की बहुतायत है। इनकी सुरक्षा के मद्देनज़र जरूरत के हिसाब से ही माइनिंग कंपनियों को आयरन अयस्क निकालने की अनुमति दी जा सकती है। लेकिन, इस सरकार को इसकी फिकर कहां! यह पूरा प्रकरण ही संदिग्ध प्रतीत होता है और उच्चस्तरीय जाँच की मांग को सुनिश्चित करता है। लेकिन इस सरकार कि नियत एवं कार्यशैली को देख कर लगता नहीं कि यह कोई उच्चस्तरीय निष्पक्ष जाँच करा पाने की स्थिति में हों।

इसलिए, अब हमे धर्म और जाति के भेदभाव भूलकर इस देश के लुटेरों के ख़िलाफ़ एकजुट हो जाना चाहिए है और इस लुटेरी तंत्र को उखाड़ फेंकने की तैयारियों में जुट जाना चाहिए। हमें वर्तमान लुटेरे ढाँचे को ध्वस्त करके हमारे क्रान्तिकारी शहीदों एवं बुजुर्गों के सपनों का झारखण्ड बनाने की दिशा  में नयी लड़ाई छेड़नी चाहिए, कठिन होगा और प्रयोगों से और चढ़ावों-उतारों से भरा होगा। पर यही एकमात्र विकल्प है। यही जन-मुक्ति-मार्ग है। यही इतिहास का रास्ता है। और हर लम्बे रास्ते की शुरुआत एक छोटे से क़दम से ही होती है…।

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