ऐसी शांतिपूर्ण एवं सफल बंदी झारखण्ड ने अपने इतिहास में पहले कभी नहीं देखी

ऐसी शांतिपूर्ण एवं सफल बंदी झारखण्ड ने अपने इतिहास में पहले कभी नहीं देखी

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झारखण्ड में भूमि अधिग्रहण संशोधन कानून और सरकार की अन्य कुनीतियों के खिलाफ इस सफल महाबंदी ने एक बात तो साबित कर ही दी है कि झारखण्ड प्रदेश का हर वर्ग रघुवर सरकार से अत्यंत दुखी है। जिस प्रकार झारखण्ड की आम जनता और व्यापारी वर्ग ने खुद ही अपने प्रतिष्ठानों को बंद रखा, ऐसा लगा कि मानो इन्हें ऐसे ही किसी मजबूत विरोध की जरूरत थी और 5 जुलाई की महाबंदी ने इनकी यह मुराद पूरी कर दी।

बंदी के दौरान की तस्वीरें

जब लोगों ने स्वतः ही बंदी कर दी तो ऐसी परिस्थिति में किसी जोर जबरदस्ती का कहीं प्रशन ही नहीं बनता। इसलिए झारखण्ड ने पहली बार अपने इतिहास में इतना शांतिपूर्ण बंदी देखा। यह भी सच है कि कहीं-कहीं कुछ छिटपुट घटनाएं जरूर हुई पर इस विषय पर वहां के स्थानीय लोगों का कहना है कि वह भाजपा के कार्यकर्ताओं की ही करतूत थी।

जिस प्रकार एक तरफ राजधानी रांची से लेकर सुदूर इलाकों तक तकरीबन सभी व्यापारिक प्रतिष्ठाने बंद रही और उन्होंने अपना काम-काज ठप्प रखा, वह रघुवर सरकार के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। क्योंकि रांची शहर के अधिकांश व्यापारिक प्रतिष्ठान भाजपा के पुराने समर्थक रहे हैं | इसका मतलब साफ़ है कि राज्य के व्यापारी वर्ग ने वर्तमान सरकार को पूरी तरह से नकार दिया है। वहीँ दूसरी तरफ जिस प्रकार राज्य के सभी बस स्टैंड और ट्रांसपोर्ट के दफ्तर सुनसान दिखे, किसी ने भी अपनी रूट की बसें खोलने की कोई इच्छा नहीं दिखाई, साबित करता है कि इनसे सभी दुखी हैं।

बहरहाल, यहाँ के नेताओं को तो सिर्फ औपचारिकता ही पूरी करनी थी जो वे किए भी, परन्तु झारखण्ड 4 जुलाई की रात को सोने के बाद 5 जुलाई को जागना ही नहीं चाहा। मतलब झारखण्ड तो अपने-आप सुबह से ही बंद था। वहीँ हेमंत सोरेन ने महाबंद की सफलता पर कहा कि अगर सरकार भूमि अधिग्रहण संशोधन काला कानून  वापस नहीं लेती और अपने चहेतों से यहाँ की भोली-भली आदिवासी और मूलवासी की ज़मीन लूटना बंद नहीं कराती है तो उनके लिए यह सिर्फ ट्रेलर है, फिल्म तो पूरी बाकी है। उन्होंने आगे यह भी कहा कि वे किसी भी कीमत पर भूमि अधिग्रहण संशोधन कानून को बर्दाश्त नहीं करेंगे।   

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