भाजपा सत्ता के लालच में बेच रहे हैं कौड़ियों में लोकतंत्र

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कर्नाटक के चुनाव से न सिर्फ़ आज के दौर में मोदीवादी के उभार की सच्चाई सामने आयी है, बल्कि यह भी ज़ाहिर हुआ कि आम तौर पर देश के चुनावों में क्या होता है। कई रिपोर्टों में बताया गया कि भाजपा ने वोट ख़रीदने के लिए किस प्रकार बेशुमार धन का दुरुपयोग किया; बीजेपी के 40 प्रतिशत उम्मीदवार तो आपराधिक रिकॉर्ड वाले थे। जिस प्रकार से भाजपा ने येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री के लिए चेहरा बनाया और रेड्डी बंधुओं को टिकट दिये, उससे मोदीवादी फासिस्टों का ‘चाल-चेहरा-चरित्र’ बिल्कुल उजागर हो गया। जब इतना करने के बावजूद वे साधारण बहुमत तक नहीं पहुँच सके, तो भगवा राजनीति के वफ़ादार सेवक राज्यपाल वजुभाई वाला को संघ का सपथ याद दिला दिया गया। तो वाला ने संघ के सच्चे सिपाही के भाँति लोकतंत्र के भाव को ताक पर रखते हुए भाजपा को अकेली सबसे बड़ी पार्टी के नाते सरकार बनाने का न्यौता दे दिया। साथ ही बहुमत साबित करने के लिए 15 दिनों की लम्बी अवधि भी।

वाला के  इस संघ भक्ति के विरोध में जब कांग्रेस कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो सुप्रीम कोर्ट ने अपनी थोड़ी लाज बचाये रखने के लिए येदियुरप्पा सरकार को 15 दिनों के जगह अब 24 घंटे में बहुमत साबित करने को कह दिया। भाजपा अब भी आश्वस्त थी कि उसके पास अमित शाह के रूप में मैकहीथ का असली अवतार तो मौजूद है। एक टीवी शो में पत्रकार के पूछे गए सवाल के ज़वाब में भाजपा नेता राम माधव ने बेशर्मी से कहा हमारे पास अमित शाह है वो बहुमत ले आयेंगे।

शाह की ख़रीद-फ़रोख़्त के हथकंडे से अपने विधायकों को बचाने के लिए कांग्रेस और जनता दल (एस) ने अपने विधायकों को बसों में भरकर हैदराबाद के एक रिज़ॉर्ट में ले गये। यह अपने आप में भारत के लोकतंत्र की नई दुर्दशा बयां करती है। कर्नाटक का पूरा चुनाव और उसके बाद भाजपा के द्वारा सत्ता के लिए किए गए सत्ता का दुरपयोग दिखाती हैं कि भारत की पूरी राजनीति अश्लील और हास्यास्पद फूहड़ता की किन गहराइयों में डूब चुकी है।

इन तथ्यों से यह सिद्ध होता है कि भाजपा सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक बेशर्मी के साथ निचे गिर सकती है। इन्होने यह कारनामा पहले भी मणिपुर, मेघालय, गोवा, बिहार जैसे राज्यों में दुहरा चुके है। इस प्रकार का ताज़ा उदाहरण झारखण्ड में देखा जा सकता है। जहाँ झाविमों सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी 6 जुलाई को वहां के राज्यपाल से मिलकर एक चिट्ठी का हवाला देकर ये गुहार लगा रहे हैं कि, 2014 के चुनावी नतीजों के बाद भाजपा ने सत्ता में आने के लिए पुरे ग्यारह करोड़ रूपये से ज्यादा लूटाकर उनके पार्टी के छह विधायकों को खरीदा है।

उन्होंने साक्ष्य के रूप में बीजेपी के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र राय के द्वारा 19 जनवरी 2015 को राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को लिखे गये पत्र की छायाप्रति को सार्वजनिक की है। जिसमे झाविमो से भाजपा में गये छह विधायक गणेश गंझू, रणधीर कुमार सिंह, नवीन जायसवाल, अमर कुमार बाउरी, आलोक कुमार चौरसिया और जानकी यादव को 11 करोड़ रुपये नकद किसने, किसको, कैसे दिए इसका भी साफ़-साफ़ जिक्र है। इनमें से केवल अमर बाउरी को एक करोड़ रुपये दिया गया क्योंकि इनको साथ में मंत्री पद से नवाज़ा जाना था। इस पत्र में यह भी जिक्र है कि रवींद्र राय ने अमित शाह को सूचित करते हुए लिखते हैं कि सभी विधायकों से प्राप्ति पर्ची इन्होंने रघुवर दास को सौंप दी है। साथ ही इन विधायकों की शेष राशि का भुगतान रघुवर दास ने इनके भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने के उपरांत उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी ली है।

बाबूलाल जी द्वारा पेश की गयी पत्र की तस्वीर

बाबूलाल जी का कहना है कि यह केवल मेरी पार्टी का सवाल नहीं है बल्कि लोकतंत्र का सवाल है। यह परिघटना लोकतंत्र पर कालिख की तरह है इसलिए पूरे मामले की सीबीआइ जांच होनी चाहिए। इनका यह भी कहना है कि चूँकि इस लेन-देन में उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ-साथ सत्ता शीर्ष पर बैठे बड़े नेताओं के नाम शामिल हैं और साथ ही इनके द्वारा 10वीं अनुसूची के कानून का मज़ाक बनाया है। इसलिए यह मामला बड़ा है, इन सभी लोगों पर तत्काल एफआइआर दर्ज हो और सीबीआई जाँच सुनिश्चित की जाय।

हालांकि अब इस चिट्टी को झूठा साबित करने के लिए पूरी भाजपा तंत्र सामने आने वाली कुछ आ भी गए हैं, इसमें कोई अचरज की बात नहीं होनी चाहिए। अचरज तो इसमें भी नहीं होना चाहिए फिर से एक बार प्रदेश की कानून व्यवस्था का मजाक उड़ेगा और सभी बेदाग़ बच निकलेंगे। लेकिन इन सभी तथ्यों के बीच जो मुख्य प्रश्न है वह यह है कि इनको इतनी फंडिंग प्राप्त कहाँ से होती है। तो जवाब निश्चित ही बड़े उद्योगपति होंगे। इसके लिए एडीआर की रिपोर्ट को पढना पड़ेगा जिसमे यह खुलासा हो पाया कि किस पार्टी को कितने चंदे मिले हैं, वह भी आगे ना हो पाये, इसका इन्तज़ाम भाजपा सरकार कर रही है। मालूम हो कि कारपोरेट चन्दे से जुड़ी जानकारी हर वित्तीय वर्ष में चुनाव आयोग को देनी होती है। लेकिन अब ऐसे खुलासे आम लोगों तक नहीं पहुँच सकेंगे, क्योंकि एडीआर के संस्थापक प्रोफ़ेसर जगदीप छोकर ने बताया कि वित्त मन्त्री अरुण जेटली ने क़ानून पास करवा दिया है कि अब इलेक्टोरल बॉण्ड की ख़रीद करके कम्पनियों और राजनीतिक दलों को यह बताना ज़रूरी नहीं होगा कि किस कारपोरेट घराने ने किस पार्टी को कितना चन्दा दिया है और किसने कितना लिया है, यह पारदर्शिता के खिलाफ है।

आज देश के सामने स्थिति यह है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले देश का चुनाव पूँजीपतियों के चन्दे पर निर्भर करता है। इन चुनावों में अक्सर वही पार्टी सत्ता में आती है, जिसे बड़े पूँजीपतियों का समर्थन प्राप्त होता है और सत्ता में आने के बाद वह पार्टी पूँजीपतियों की सेवा में जुट जाती है। यही कर्ज झारखण्ड प्रदेश की रघुवर सरकार अडानी-अंबानी को यहाँ ज़मीन एवं संसाधन लूटा कर कर उतार रही है। इस तरह से पूँजीवादी चुनाव इस कहावत को सच साबित कर देते हैं कि जिसका खायेंगे उसका गायेंगे।

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